चिंता नहीं चिंतन की आवश्यकता-शोभा सृष्टि

चिंता नहीं चिंतन की आवश्यकता-शोभा सृष्टि

आज डॉटर्स डे के खुशी भरे अवसर पर मैं सभी महिलाओं और बेटियों को बधाई देती हूँ।आज बेटियों ने सभी क्षेत्रों में अपनी काबिलियत और जज्बे से परचम लहरा दिया है वे न केवल घर की शान बल्कि देश की शान भी बढ़ा रही है।चाहे घर हो या राजनीति खेल हो अथवा सैन्य क्षेत्र सभी
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रिश्तों में आती दूरियां-विपन्न कुकुमार

प्यारे श्रोताओ , दोस्तों, बंधुओ, मेरे अपनों, आप सब को मेरा आदर सहित नमस्कार | आज मैं बात करूँगा रिश्तओं में आती दुरिओं और कम होते दायरे की | कभी संयुक्त परिवार का ज़माना था | एक ही छत के निचे परिवार के कई सदस्य मिल जुल कर रहा करते थे, सबका खाना भी एक
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भारतीय अर्थव्यवस्था-दीशा शाह

आज के समय में पैसा इतना आवश्यक हो गया है की लोगो को केवल पैसो से मतलब है .भारत की संस्कृति मर्यादा ,विनय, विवेक , बड़ो छोटो के साथ आज कल ये नहीं दिखाई दे रहा है . लोगो को सिर्फ पैसा को जरुरी समजते है . इज्जत मर्यादा मानसन्मान सब भूल गए है .
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यह कैसा सितम- सीमा पोद्दार

ओह आज शादी का दिन, और मैं पार्लर भी ना जा सकी। घर में इतना काम, यह सोच-सोचकर दुलहन की सगी मामी जी का जो 36 37 साल की थी ,उस महिला का बुरा हाल हो रहा था ।शादी से कई दिन पहले से ही चेहरे पर भारी भरकम मेकअप करवा कर चेहरे का बुरा
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हिंदी भाषा का महत्त्व-दिशा शाह

आज के समय में हिंदी भाषा को कोई माहत्व नहीं देते है . कितने ऐसे लोग है ,उन्हें हिंदी लिखना तोह दूर की बात है , बोलना भी नहीं आता है . आज कल अंग्रेजी भाषा बोहोत आवश्यक है , यहाँ हिंदी भाषा की कोई वैल्यू नहीं है , हिंदी को कोई पूछता भी नहीं
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शिक्षक का सम्मान बदलते परिवेश में-दिशा शाह

आज के समय में कुछ कुछ शिक्षक , शिक्षा का व्यवसाई बना दिये है . कुछ कुछ शिक्षक अपना कर्त्तव्य भूल गये है. शिक्षा के क्षेत्र में डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने देश का गर्व से उचा कर दिया था . डॉ राधा कृष्णन का कहेना था की सही शिक्षा दी जाये तोह समाज में बुराई
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पर्युषण का पर्व-दिशा शाह

पर्युषण जैन धर्म का त्यौहार है . जैन धर्म अहिंसा परमो धर्म है .पुरे विश्व का उत्तम त्यौहार है क्यों की इसमें आत्मा की उपासना की जाती है . ये त्यौहार ८दिन का होता है , ८दिन कंदमूण का त्याग . कंडमूर्ण यानि आलू प्याज , लशुन , और हरे सब्जी का त्याग ८दिन तक
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शिक्षक का सम्मान बदलते परिवेश में-बृजेश पाण्डेय 

शिक्षक बहुप्रतिष्ठित एवं गरिमामय पद है, जिसके समक्ष शीश स्वयं ही श्रद्धा से नतमस्तक हो जाता है। “शिक्षक की गोद में नाश और निर्माण दोनों खेलते हैं।“ यह रोषपूर्ण वाक्य आचार्य चाणक्य ने घनानंद के द्वारा अभद्रता किये जाने के अवसर पर कहा था। आज शिक्षक और अधिक अपमानित हो रहा है। छात्र के मस्तिष्क
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शिक्षको का सम्मान करो-पुष्कर कुमार

किसी भी मनुष्य के जिवन मैं माता-पिता से ज्यादा शिक्षक का महत्व होता है,क्योकि माता-पिता तो बच्चो को जन्म देते है,और पाल-पौष कर बड़े करते है। पर दुनिया मे कैसे जिया जाए,किस व्यक्ति से क्या व्यवहार किया जाए,रहन-सहन कैसा हो यह शिक्षक ही सिखा सकता है। शिक्षक अगर द्रोणाचार्य तथा चाणक्य जैसा हो और विद्यार्थी
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गणतंत्र के लिए वोट करे-तुषार सेन

जनता जब आर्थिक न्याय की मांग करती है, तब उसे किसी दूसरी चीज में उलझा देना चाहिए, नहीं तो वह खतरनाक हो जाती है. जनता कहती है हमारी मांग है महंगाई बंद हो, मुनाफाखोरी बंद हो, वेतन बढ़े, शोषण बंद हो, तब हम उससे कहते हैं कि नहीं, तुम्हारी बुनियादी मांग गोरक्षा है. बच्चा, आर्थिक
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