अनमोल रिश्ता (भाई बहन का प्यार)

Ashish Ghorela

उभरते हुए रचनाकारों और लेखकों को एक समृद्ध मंच प्रदान करने के लिए मैंने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर 26 जनवरी 2017 को साहित्य लाइव की शुरवात की। जिससे उभरते हुए रचनाकारों का सम्पूर्ण विकास हो सके तथा हिंदी भाषा का प्रचार और विकास में वृद्धि हो सके। वैसे मैं हिसार (हरियाणा) का निवासी हूँ और दिशा-लाइव ग्रुप का संस्थापक हूँ।

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यह क्हानी है- गाँव विचारपुर की जो आशीष घोड़ेला के खवाबो की दुनिया मे बसा है। इस गाँव मे अनेको परिवार रहते थे। उनमे से एक परिवार मे केवल दो भाई-बहन थे। जिनके माता-पिता पहले मर चुके हैँ। इन दौनो भाई बहन मे बहुत गहरा प्यार था। भाई का नाम रामकिश्न व बहन का नाम
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दशहरा के दिन करीब आते जा रहे है। एक दिन मन मे खयाल आया कि क्योँ न हम इसे अलग तरीके से मनाए। केवल पुतले को जलाने से क्या होता है? इससे केवल प्रदुषण और धन बर्बादी होती है। बहुत सोचने के बाद मन मे खयाल आया कि हम इस बार रावण तो जरुर जलाँएगे
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किसी स्थान पर एक महान चित्रकार रहता था। एक बार उसने बाल कन्नहिया का चित्र बनाना चाहा। उसने अनेकोँ चित्र बनाए पर उसे एक भी पसंद नहीँ आया। वह उदास रहने लगा। पंरतु एक दिन रास्ते मेँ चित्रकार ने एक बहुत सुन्दर, मासूम, भोला, तैजस्वी, मनमोहक, बालक देखा। उसके देखते ही उसके मन मे क्रष्ण
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पहचानने को हम भुलेँ नहिँ आँख मुंदकर हम बेठेँ नहिँ स्वतंत्रता हमारी थी और हमारी रहेगी देश के लिए कल वो मरेँ, तो आज हम भी मर सकतेँ हैँ भारत माता के अरमान पुरे कर सकतेँ हैँ पर साथी मेरे गुमराह हो जाते हैँ थोडेँ से लालच मेँ नुक्सान देश को पँहुचा देते हैं भुल
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एक बार मैँ अकेला विदेश घुमने गया। वहाँ पर मुझे टिब्बो से गुजरना पड़ा। अचानक एक जोरदार तुफान आया। तुफान सच मेँ बहुत भयँकर था। इतना तेज की मुझसे चला ही नहिँ जा रहा था। फिर एक तेज जोरदार हवा का झोँका मुझे उड़ा ले गया। और एक खड़े मेँ गिर गया। मैने अपने पाँव
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हमने एक बात सुनी है कि सबसे भयंकर क्या है? जिससे भगवान भी डरता है। वह है परीक्षा। इस तीन अक्षरोँ से बने शब्द से आज तक तीनोँ लोकोँ मेँ कोई नहीँ बच पाया है। पशु, पानी, जानवर, मनुष्य, राक्षस और भगवान भी! हम जन्म से लेकर मुरत्यु तक हम परिक्षाएँ देते रहते है, और
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आया बेसाखी का त्यौहार सगं लेकर गेहूँ कटाई का समाचार गेहूँ हो गई है पक्क कर तैयार देख-देख इसको खुश होए किसान मुछोँ पर हाथ फेरे, सपने पुरे होते देखे किसान मचा दी इसने धूम, शुष्क हवाओँ की फिर सुनाई दी गुजँ पसीने को पोंछता, ग्रमी और धूप से लड़ता किसान जी तोड कटाई मे
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हवा की ये मतवाली चाल फूलोँ की झूमती डाल रंग-बिरगेँ किटोँ का जाल इसको कष्ट ना पहुँचाना रे मानव ! छु गई है दिलको मरे आया बसंत बनकर ये कैसा मेहमान खेलती है संग मेरे ये खेल ग्रीष्म मे जला दिया, शीत मे जमा दिया रुठ गए हमतो, बसंत मनाने चला आया उदासी भरे जीवन
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क्हने को तो भारत हो गया था आजाद 15 अगस्त सन 1947 को 64 वर्ष बीत गए हैँ-2 अबतक हुआ नहीँ पूर्ण आजाद है यहाँ अभी भी लुट-डकैत और भ्रष्टाचार इसके लिए लडे है कई देशभक्त अन्ना हजारे और कई हजार कोई लडता है धन के लिए कोई लडता है परिवार के लिए पर हमारे
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हमारे देश की है जो आन मेहनत है जिसकी शान ऊँचा है जिसका मान और नहिँ वो है हमारा किसान कडी धूप मेँ तपके जिसने बनाई बँजर हरि-भरी गर्मी सर्दी सहि जिसने खरी-खरी दुनिया का भरता है जो पेट मुश्किले और संघर्ष साथ है जिसके घडी-घडी बनना चाहते है इनके बच्चे भी डाक्टर इंजिनियर और
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