दशहरा के दिन करीब आते जा रहे है। एक दिन मन मे खयाल आया कि क्योँ न हम इसे अलग तरीके से मनाए। केवल पुतले को जलाने से क्या होता है? इससे केवल प्रदुषण और धन बर्बादी होती है। बहुत सोचने के बाद मन मे खयाल आया कि हम इस बार रावण तो जरुर जलाँएगे

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किसी स्थान पर एक महान चित्रकार रहता था। एक बार उसने बाल कन्नहिया का चित्र बनाना चाहा। उसने अनेकोँ चित्र बनाए पर उसे एक भी पसंद नहीँ आया। वह उदास रहने लगा। पंरतु एक दिन रास्ते मेँ चित्रकार ने एक बहुत सुन्दर, मासूम, भोला, तैजस्वी, मनमोहक, बालक देखा। उसके देखते ही उसके मन मे क्रष्ण

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एक बार चार व्यापारी (हिन्दू, मुस्लमान, सिक्ख, और ईसाई) तागेँ मे जँगल से गुजर रहे थे। अचानक ऊँचे रस्ते पर घोड़े को एक काला साँप दिखाई दिया और घोड़ा कुदने लगा। जिससे ताँगा निचे गहराई मे चा गिरा। आवाज सुनकर नजदिक से एक लकड़हारा दौड़ा आया। उसने उन चारोँ की मदद की। जैसे ताँगे को

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