महफ़िल सजा ली यारों की, तो हुई बदनामी
बगिया खिला ली बहारों की, तो हुई बदनामी
यह कैसा समाज, जो बदनाम करता फिरता है?
मदद कर दी बेसहारों की, तो हुई बदनामी।

किसी पे दिल अगर ये मर लिया, तो हुई बदनामी
बाँहों में किसी को भर लिया, तो हुई बदनामी।
बदनामी के दौर में भला कौन है बदनाम नही?
कभी प्यार किसी से कर लिया, तो हुई बदनामी

अगर आजदी से घूम लिया, तो हुई बदनामी
महफ़िल में कभी झूम लिया, तो हुई बदनामी
प्रेम को बदनाम कर दिया जालिमो ने इतना
माथा जो उसका चूम लिया, तो हुई बदनामी।

रोकूँ कैसे यारों आज होने से बदनामी?
स्याही के कुछ दाग भी धोने से बदनामी
जिसको पाकर बदनाम ही बदनाम हुआ हूँ
छोड़ दूँ अगर साथ उसे खोने से बदनामी।

जब ज्यादा हो पैसा, तो होती है बदनामी
चाहें गरीब हो कैसा, तो होती है बदनामी
जब बदनामी का दौर है, फिर मैं कैसे बचूँ?
हो इन्शान मेरे जैसा, तो होती है बदनामी।

अक्सर समाज में हर जगह मिलती है बदनामी
बहारों में भी फूल की जगह खिलती है बदनामी
कोई बताये वो जगह, जहाँ होतीं ना बदनामी
जिधर देखो हर जुबान से निकलती है बदनामी।

कांटे नही उससे बढ़कर है सुई बदनामी
हवा से हल्की उड़ने वाली रुई बदनामी
जितना खुद को रोका बदनाम होने से
उतनी ज्यादा और अक्सर हुई बदनामी।

© राहुल रेड
फर्रुखाबाद उत्तर प्रदेश
संपर्क 8004352296

बदनामी Gazel By Rahul Red
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