मैं कवि… (कविता) —————————– कभी अक्षर की खेती करता कभी वस्त्र शब्दों के बुनता बाग लगाता स्वर-व्यंजन के मात्राओं की कलियां चुनता मैं कवि, कृषक के जैसा करता खेती कविताओं की और कभी बुनकर बन करके ढ़कता आब नर-वनिताओं की भूत-भविष्य-वर्तमान सभी तीनों काल मिले कविता में बर्फ के मानिंद ठंडक मिलती ताप मिलेगा जो

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खाली कन्धे हैं इन पर कुछ भार चाहिए बेरोजगार हूँ साहब मुझे रोजगार चाहिए जेब में पैसा नही डिग्री लिए फिरता हूँ दिनो दिन अपनी ही नजरो में गिरता हूँ कामयाबी के घर में खुले किवाड़ चाहिए बेरोजगार हूँ साहब मुझे रोजगार चाहिए। दिन रात एक करके मेहनत बहुत करता हूँ सूखी रोटी खाकर ही

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जिंदगी की जंग जीत जाने की हिम्मत तो है रोजगार ना सही पर कमाने की हिम्मत तो है वक्त बेवक्त मिले फिर भी कोई गम नही सूखी रोटी ही सही खाने की हिम्मत तो है महलों में रहने की “राहुल” तेरी औकात नही पर तिनका-तिनका जोड़, घर बनाने की हिम्मत तो है डूब गयी पतवारें

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देखी तूने सुकमा की हालत ,शहीदों की बौछार लगी है ….भारत भूमि को बचाने की ,तेरी वह सौगंध किधर है  ।। नजर उठाकर जिधर भी देखूं ,तेरी ही सरकार उधर है ….फिर कैसी विवशता है तेरी, वो गरजती आवाज किधर है।।मेरे एक दोस्त ने पूछा ,  56  इंच के सीने को ठोका…..मोदी भक्त बने फिरते

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Aarakshan :: वंदे मातरम मैं दीपक कौशिक, हरियाणा राज्य के भिवानी जिले के पुर गावँ का निवासी हूँ । जो समाज में मुझे दीखता है वही मैं अपनी कविताओं में लिखता हूँ । “जो देखा वो लिखा” कुछ समय पूर्व हरियाणा में आरक्षण को लेकर आंदोलन हुआ जिसने हिंसक रूप ले लिया था । उसी

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हे सत्य सनातनहे अनंतहे शिव भोलेहे जगत-कंत हे शक्ति नियंतासंघारकहे डमरू,त्रिशूलके धारक हे महादेवहे शिवा पतितव ध्यान मग्नसब योगी-यती ले अतुल भक्तिविश्वास धारमैं रहा आजतुझको पुकार मम् वंदन कोस्वीकार करोइस धरती केसंताप हरो… ***********         < p dir=”ltr”>-विश्वम्भर पाण्डेय ‘व्यग्र’           गंगापुर सिटी (राज.) वंदन Poem by विश्वम्भर पाण्डेय ‘व्यग्र’Rate this post

बेटियां आन होती हैं, बेटियां शान होती हैं , हर एक देहलीज़ की .. अपनी बड़ी पहचान होती है, किसी बापू के कांधे अब कभी भी झुक नही सकते …. कलेजे के ये टुकड़े हैं , ये स्वाभिमान होती हैं | मुकद्दर के सिकंदर अब यंहा बेटे ही नही होते , शिखर ऊँची पे …

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जीवन बीता जाये, भाई रे… जीवन बीता जाये ! भरा नहीं आलस में मैंने, ये घट रीता जाये !! भाई रे… मन मकड़ी ने बुने जाल सब, रस की चाहत, पर दे कपास कब, फँसता गया, निकल ना पाया, उलझन को सुलझन समझ कर, मैंने दिन बिताये | भाई रे… जीवन बीता जाये ! घड़ी

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             कलयुग की सोच  ?नयी सदी से मिल रही, दर्द भरी सौगात! बेटा कहता बाप से, तेरी क्या औकात!! ?पानी आँखों का मरा, मरी शर्म और लाज! कहे बहू अब सास से, घर में मेरा राज!! ?भाई भी करता नहीं, भाई पर विश्वास! बहन पराई हो गयी, साली खासमखास!! ?मंदिर

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   दस्तक कुछ खास नहीं बदले हम , आपके जाने के बाद भी बस फर्क इतना सा है , कभी – कभी तेरी याद दस्तक दे जाती है जालिम बिलकुल तेरी तरहा |  मनमोहन गुर्जर दस्तकRate this post