नजर कुछ कहती है-श्रीलाल कुशवाहा

नजर कुछ कहती है-श्रीलाल कुशवाहा

चोरी-चोरी, नजर कुछ- कहती है, डर-डर चुपके-चुपके, मगर हो रही है-, खबर ऐ- ओ, बेखबर ! कहती है- ये नजर प्यार कर, कर प्यार- प्यार में खुद को बेकरार कर, मिला नजर से नजर (चोरी-चोरी, चुप-चुप कर) ||२|| चोरी-चोरी, नजर कुछ- कहती है, डर-डर चुपके-चुपके, मगर हो रही है-, खबर … .. . नजर-ए-दिल –
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हम सागर के सागर हैं- श्रीलाल कुुुुशवाहा

हम सागर के सागर के हैं… .. हम- सागर के सागर है . ..और, हम-“सर”/”मैडम”आपको भी, ले- डूबेंगे | हमें-.. . जान जाओगे तो-जान से जाओगे, हमी- में समा जाओगे | इस- तरह यूं खामोशी में हम इतने- सुख ! दुख ! दुख-सुख इतना समेटे हुये हैं, कि- सुनोगे… .. . तो- सुनने मात्र से
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अखंड भारत की ओर -आलोक पाण्डेय

आघातों की राहों में सुन्दर मुस्कान बढाता जा, राष्ट्रदूत हे वीर व्रती भारत को भव्य सजाता जा, सुस्थिरता को लाता जा । अगणित कर्तव्यों के पुण्य पथ पर शील, मर्यादाओं के शिखर पर धन्य ! स्वाभिमानी वीर प्रखर सतत् रहे जो निज मंजिल पर । वसुधा की विपुल विभूति तू विजय का हर्ष लाता जा
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जीवन की धार समझ-आलोक पाण्डेय

रूप चमका- चमका के यों ही ज्यों मतंग मलंग घुमत ह्वै फटी गुदरीया , लुटी डुगरिया मनवा फिरंगी बन भनत चलत ह्वै । तन ऐंठे-ऐंठे से ऐसे , जाने क्यों देह अड़ाय खले ! गल- गलित नहीं बेढंग पकड़ , संस्कार भी तो हो अपनाए भले ! यौवन की सुधी ना तूझको, रसधार सुधा क्यों
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वे लोग-आलोक पाण्डेय

उदासीन जीवन को ले क्या-क्या करते होंगे वे लोग न जाने किन-किन स्वप्नों को छोड़ कितने बिलखते होंगो वे लोग। कितने संघर्ष गाथाओं में, अपनी एक गाथा जोड़ते होंगे वे लोग पर भी, असहाय होकर कैसे-कैसे भटकते होंगो वे लोग। कुछ बाधाओं से जूझते परास्त नहीं कैसे होते होंगे वे लोग; जीवन को दाँव लगा
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चौथेपन में- अशोकदीप

नीरस तन की करुण कहानी नित अंधकूप से टकराए आह -अनल हाथों में लेकर प्रतिध्वनि बनकर लौट आए व्यथित ग्राम की इक ज्वाला- सा एकाकी मन जले विजन में । परिजन क्या परछाया तक भी पास न ठहरे चौथेपन में ।। निर्मम नाग विषैले घर के पल-पल काया डसने लगते अभिलाषा के सुमन सूखते शूल
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वो आँगन वाला घर -प्रशांत अग्रवाल

फिर से याद आगया वो आँगन वाला घर होती थी खुशियां जहां झोली भर करते थे हसी ठिठोली वहां मिलजुलकर रह गया वो आँगन अब अंजान बनकर वो आँगन ही था खेलते थे सभी मिलजुलकर और काटी थी पतंगे हजारें एक अजनबी बनकर डलता था झूला हर साल उस आंगन के जाल पर रह गया
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भारती-निशा निक

आज तुम ने हमें रूकने को कहा, रूकते ही आलाप शुरू कर दिया। क्या आंसू किराये पर लाये थे, हमारे आते बाल्टी भरना शुरू कर दिया। माना बेपाक़ दिल नही तुम्हरा, पर पाक़िज़ा है आंचल मेरा। तुम बेसक़ पेहनते हो साफ कपङे , पर बेदाग़ है ज़मी मेरा। मैं तो खुदा की आयतो को पढकर
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आमवश- निशा निक

मानो आमवश रात है उस पे अज्ञान तीमिर की घात है मुहँ बाह्ये खङा है हर कोई इंसानियत खा जाने को धर्म बिकता है बाजारो को जिन्होने धर्म जाना नही क्या लिखा है गीता,कुरान,बाइबल में ये कभी माना नही शब्दो को पढ के उलझा दिया इंसनियत को बने थे जो धर्म समाज चलाने को बेक
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आजादी -प्रशांत अग्रवाल

आएगा वो दिन आजादी का जब पूरी इंडिया जश्न मनाएगी उसी इंडिया के किसी कोने में वो बिटियां अपने आसूं बहाएगी कब आएगा आजादी का दिन ? कब आएगा आजादी का दिन ? ये कहकर अपनी आवाज को कर बुलंद वो बिटियां सरकार पहुंचाएगी यही सरकार इस बुलंद आवाज को अपने पैरों तले दबाएगी आगया
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