सपने – नविन

सपने – नविन

मेरे जीवन का आधार हैं मेरे सपने, मेरी खुशियों का पैगाम हैं मेरे सपने, मेरे अपने विचार हैं मेरे सपने, अपने भी साथ न दे, साथ देते हैं मेरे सपने, नविन भरतपुर (राजस्थान)

“हम उस इश्क़ को इश्क़ क्या कहें” – सचिन ओम गुप्ता

हम उस इश्क़ को इश्क़ क्या कहें, जो पहली नजर में आँखों में बसी न हो.. हम उस इश्क़ को इश्क़ क्या कहें, जो देखकर इश्क़ को शरमायी न हो… हम उस इश्क़ को इश्क़ क्या कहें, जो ख़्वाबों में आई न हो… हम उस इश्क़ को इश्क़ क्या कहें, जो इश्क़ की ज़ुल्फो से
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विश्वास – पूजा चौहान

अब से करते हैं शुरुआत नई खुद पर करें विश्वास अभी दिल में जगाँए उमंग नई फिर से फैलाएं तरंग वही सूरज की किरणों से ले ले तिनका-तिनका रोशनी चांद की चांदनी से ले ले हल्की-हल्की रागिनी चलते हैं उन राहों पर ,जो देख रहे हैं रास्ता सभी निभाते हैं उन वादों को, जो खुद
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खुशियाँ – पूजा चौहान

खुशियां तेरे जीवन में आए दुख तुम पर कभी ना छाएँ तेरी प्यारी सी मुस्कान पर खुदा भी हंसना चाहे जब तू रोए तेरे साथ हम भी रोना चाहे | तेरे सपनों की उम्र बढ़ती जाए ऐसी मेरी दुआ तुझ पर लग जाए , कि तू अपने सपनों को साकार कर जाए | ख्वाबों में
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तन्हाई – पूजा चौहान

जाने कहाँ से कुछ करने की हिम्मत सी आई है जाने क्यों आज शायद मेरी कोशिश रंग लाई है चलती थी सबके संग पर क्यों, आज तन्हाई ही मुझ पर छाई है | पहले तो ये देती थी गम ,कर देती थी आंखें यू नम, पर पहली बार इसने मुझे अपनी खामोशी की गूंज सुनाई
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रिश्ते मे मिलावट – नेहा श्रीवास्तव

मै जो हुँ बस वही हुँ , अपनी शख्सियत मे कोइ बनावट नही करती. चाहो तो आजमालो मुझे इक दफा फिर से ,मै रिश्तो मे कोई मिलावट नही करती. सलिके से माफ करने का हुनर जानती हुँ. सच कहुँ तो मै अपने दुश्मन से भी बगावत नही करती. नेहा श्रीवास्तव उत्तर प्रदेश (बलिया)

प्रेमात पडायचं राहूनच गेलं – विशाल परशुराम मुळे

बालपण खेळण्यात गेलं तारुण्य जबाबदारीनं हेरलं । संस्कार जपलेल्या मनाचं प्रेमात पडायचं राहूनच गेलं ॥ वेडावलेल्या या मनाला कलागुणांनी घेरलं । कलागुण प्राप्तीसाठी अहोरात्र खपलं । संस्कार जपलेल्या मनाचं प्रेमात पडायचं राहूनच गेलं ॥ कलाप्रेमीच्या या आयुष्यात मैत्रिणीही खूप भेटल्या । सरळ मनाच्या या वेड्यानं सर्वांनाच ताई बनविलं । संस्कार जपलेल्या मनाचं प्रेमात पडायचं राहूनच
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विसरतोय तुला – माधव दादाराव मुळे

तू दिलाय दगा तरी जगेल मी त्यांच्यासाठी रात्रनं दिस राबलेत ते फक्त ग माझ्यासाठी तुझ माझ नात ग आत्ताच गुंतलं आई बाबांनी तर मला जन्माला घातलं मी त्यांचे उपकार कसे ग विसरू मोकळे जरी सोडले आपण तरी गाई पासून दूर जातेका वासरू मुक्या जीवाला कळते मंग मला का नाही जगात सर्व श्रेष्ठ असते बाबा आणि
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माणूसपण दाखविणारी – विशाल परशुराम मुळे

लाल झालेल्या सिग्नलवर गाडी मी थांबविली । थांबताच माझी गाडी अचानक ती दिसली ॥ चेहरा तिचा कोमल रुमाल ती सावरत । झाडू हातात घेऊन गार थंडीने कुडकुडत ॥ गाडीच्या माझ्या मी काचा बंद करून होतो । जॅकेट अंगात असूनसुद्धा थंडीने कुडकुडत होतो ॥ रोडवरील सारा कचरा झाडूने ती झाडत होती । गाडी अचानक आल्यावर घाबरून
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तुझमें समा जाऊं- शुभम् लांबा

जब तुम हो पास मेरे, मैं क्यूं न हद से गुजर जाऊँ। जिस्म बना लूँ मैं तुम्हें, या‌‌ रूह मैं तुम्हारी बन जाऊँ। तु कहे अगर इक बार मुझे, मैं खुद ही तुझमें समा जाऊँ। लबों से छूँ लूँ जिस्म तुम्हारा, सांसों में सांसें जगा जाऊँ। अपनी जिंदगी बना लूँ मैं तुम्हें, और मरने की
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