याद आ रही बचपन की गाँव के उन पलों की
नही भा रही हवा मुझे शहर के जलजलों की

सरसों के खेतों में भाग-भाग कर पतंग लूटना
पहिया चलाने वाले दोस्तों का साथ छूटना

छुपा छुपाई का खेल लम्बी कूद,पेड़ों पर चढ़ना
यारी ऐसी थी हमारी सुबह दोस्ती शाम को लड़ना

गाँव की सुहानी हवा आँगन में चिलचिलाती धुप
चूल्हे की दो रोटी खाकर मिटती थी हमारी भूख

छत पर सूखती थी मक्का,आँगन में भुट्टों के ढेर
बागों में बीनते थे आम, छुट्टी में तोड़ते थे बेर

कलम हमारी बनती थी छप्पर की एक लकड़ी से
छुट्टियों का मजा उठाते खाकर खीरा ककड़ी से

ट्यूबवेल का पानी जिसमे घण्टो करते मनमानी
नाच नाचकर खूब नहाते रखते थे बहुत शैतानी

अब सब छूट गए वो काम छूट गए वो खेल
जब गाँव की गलियो में चलती थी अपनी रेल

गाँव में जो सुकून मिला था बगीचों की कलियों में
नही ढून्ढ पाया आज तक मैं शहरों की गलियों में।

© राहुल रेड
फर्रुखाबाद उत्तर प्रदेश
मोबाईल 8004352296

बचपन की यादें Poem By Rahul Red
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