आंगन खेलने की उम्र, ना जाने कब गबाइ।
बेटियां क़्यो होती है, दुखों की परछाई।।
हर गम, हर तकलीफ, झेलती है बेटियां ही।
हर कुर्बानी, हर त्याग, देती है बेटियां ही।।
अपने परिबरो के लिए, मर मिटती है बेटियां ही।
हर कदम पर साथ, देती है बेटियां ही।।
ना जाने फिर भी क़्यू, पराई होती है बेटियां ही।।

Sonam Singhसोनम सिंह,
पटना (बिहार)

बेटियां – सोनम सिंह
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