दृष्टिदोष

समझा नहीं किसी ने, समझेगा उस दिन
जब मैं दुनियाँ छोर चला जाऊँगा !
खोजेगी दुनियाँ, पर मैं मिलूँगा नहीं !!

देखते हैं लोग अपनी दृष्टि से,
जितने लोग उतनी दृष्टि से !
भला कैसे दिखेगी दुनियाँ एक जैसी ?

जो है वो दिखता नहीं,
दिखता वह, जो है नहीं!
देखेगी दुनियाँ, जब रहूँगा नहीं,
है पर दिखता नही, दृष्टि में है दोष, दिखेगा नहीं !!

है एक, हम देखते अनेक,
भ्रम है, या फिर दृष्टिदोष ?
मन और दृष्टि साफ करो, दिखेगा केवल एक !!

प्रोo लक्षमीनारायण मंडल
कुर्सेला, कटिहार

दृष्टिदोष Poem BY प्रोo लक्षमीनारायण मंडल
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