नाच रहा है मोर Poem By सचिन अ. पाण्डेय

नाच रहा है मोर

हो गया है भोर,
वर्षा हुई घनघोर;
बाँधे प्रीति की डोर,
नाच रहा है मोर|

बयार चल रही चारों ओर,
तृप्त हुआ अवनी का एक-एक छोर;
बाँधे प्रीति की डोर,
नाच रहा है मोर|

उर में हर्ष नहीं है थोर,
दादुर मचा रहे हैं शोर;
बाँधे प्रीति की डोर,
नाच रहा है मोर|

धरणी कहती- आनंदित है पूत मोर,
कहाँ छिप गया दीनकर चोर;
बाँधे प्रीति की डोर,
नाच रहा है मोर|

जीव-जंतु हुए आनंदभोर,
टूट गई ग्रीष्म की डोर;
बाँधे प्रीति की डोर,
नाच रहा है मोर|

                        -  सचिन अ. पाण्डेय
नाच रहा है मोर Poem By सचिन अ. पाण्डेय
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