नाच रहा है मोर Poem By सचिन अ. पाण्डेय

Get Website for Your Business, we're here for you!
DishaLive Web Design & Solutions

नाच रहा है मोर

हो गया है भोर,
वर्षा हुई घनघोर;
बाँधे प्रीति की डोर,
नाच रहा है मोर|

साहित्य लाइव रंगमंच 2018 :: राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी प्रतियोगिता • पहला पुरस्कार: 5100 रुपए राशि • दूसरा पुरस्कार: 2100 रुपए राशि • तीसरा पुरस्कार: 1100 रुपए राशि & अगले सात प्रतिभागियों को 501/- रुपये प्रति व्यक्ति

बयार चल रही चारों ओर,
तृप्त हुआ अवनी का एक-एक छोर;
बाँधे प्रीति की डोर,
नाच रहा है मोर|

उर में हर्ष नहीं है थोर,
दादुर मचा रहे हैं शोर;
बाँधे प्रीति की डोर,
नाच रहा है मोर|

धरणी कहती- आनंदित है पूत मोर,
कहाँ छिप गया दीनकर चोर;
बाँधे प्रीति की डोर,
नाच रहा है मोर|

जीव-जंतु हुए आनंदभोर,
टूट गई ग्रीष्म की डोर;
बाँधे प्रीति की डोर,
नाच रहा है मोर|

                        -  सचिन अ. पाण्डेय
नाच रहा है मोर Poem By सचिन अ. पाण्डेय
Rate this post

0
साहित्य लाइव रंगमंच 2018 :: राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी प्रतियोगिता • पहला पुरस्कार: 5100 रुपए राशि • दूसरा पुरस्कार: 2100 रुपए राशि • तीसरा पुरस्कार: 1100 रुपए राशि & अगले सात प्रतिभागियों को 501/- रुपये प्रति व्यक्ति

Leave a Reply

Create Account



Log In Your Account