मिट्ठी की गुड़ियों से खेलकर,
कब इतनी सयानी हुई।
तेरी ममता की अंचल मे,
जाने कब मैं बड़ी हुई।
बचपन की वो प्यारी यादे,
आज भी सब कुछ ताजा है माँ।
तुम ही रहती दिल के घर मे,
प्यार ये तेरा कैसा,माँ
दुनिया की तपिश मे
शीतल छाया देती,माँ
जब भी मैं उदास रहु।
बस तुम याद याती, माँ
जिंदगी की गालियो मे,
मैं अभी कचा हु,माँ।
रिस्तो की गहराइयो से,
बिल्कुल भी नादान हु,माँ
पागल हु नासमझ हु
जैसा भी हु तेरा बच्चा हु माँ।।

Sonam Singhसोनम सिंह,
पटना (बिहार)

तेरा बच्चा हु माँ – सोनम सिंह
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