कैलाश को समझ में नहीं आ रहा है कि कई कोशिशों के बावजूद उसे अपने काबिल बेटों के लिए बहुएं क्यों नहीं मिल रही हैं? जबकि वह तमाम जतन कर चुका है! यहां तक कि वह शादी डाॅटकाम में, अनेक शहरों-नगरों के मैट्रोमनीज्स में, अपने बेटों के बायोडाटा का रजिस्टेशन करवाया है।
छोटे-बड़े सभी समाचारपत्रों में लगातार इश्तहार तक दिया है; जिसमें ऐलान किया  है कि उसे दहेज का तनिक लालच नहीं है। उसे केवल और केवल बहुएं चाहिए। उन्हें एक साड़ी में भी विदा करेंगे, तो भी स्वीकार्य होगा।
यह भी कि वह बहुओं की शादी अपने खर्चे से करने के लिए तैयार है। फिर चाहे जितना भी खर्च आए। वह नामी-गिरामी पंडितों को भी इस काम में लगा रखा है। वह रिश्तेदारों और मित्रों से लड़कियां पता करवा रहा है; लेकिन अफसोस कि कहीं से कोई जवाब नहीं आ रहा है। किसी से बात जम नहीं रही है। यही नहीं, वह क्षेत्र, प्रांत, धर्म व जाति के बंधन को तोड़ने को तैयार है।
लिहाजा, कहीं-कहीं लड़की होती है एक; पर उसे पसंद करनेवाले और मुॅंहमांगा लालच देनेवाले होते हैं अनेक। गोया, एक अनार; सौ बीमार की हालत हो गई हो। अब तो उसे लगता है कि वह इस दौड़ में पिछड़ने लगा है।
तभी उसे ख्याल आया कि लड़कियों की इस कमी के लिए वह भी कम गुनेहगार नहीं है। वह अपनी दो-दो बेटियों को गर्भ में ही मौत की नींद सुला चुका है। पहले अभी सरीखा कड़क कानून नहीं था, इसलिए उससे यह कसूर धोखे से हो गया है।
इसका ख्याल आते ही तीस बरस पुरानी वह धटना उसके दिलोदिमाग में एक-एककर कौंधने लगा, जिसमें उसने ऐसा महापाप किया था। ओह…वह अपना माथा पीट लिया। उसे अब पछतावा होने लगा। लेकिन अब होत क्या, जब चिड़िया चुग गई।
अब उसे बेटियों का महत्व समझ में आने लगा कि बेटियों को मारेंगे, तो बहू कहां से लाएंगे। यही दुनिया की रीत है। वह भी इसी दुनिया का वाषिंदा है।
कथाकार का पूरा नाम एवं पताः
वीरेंद्र देवांगन
बोरसी, दुर्ग , छत्तीसगढ़
9406644012
गुनाह (लघु कथा) – वीरेंद्र देवांगन
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