New Hindi Story: दूध की लालसा – कहानी (विजय सिंह मीणा)

बाण गंगा नदी पूरे उफान पर थी । उसके दोनों किनारों पर दूर दूर तक अथाह जल राशि दिखाई दे रही थी । सावन-भादों के महीने में हर साल यह अपने पूरे यौवन पर होती  है । आसपास के खेत ज्वार और बाजरा की फसलों से लहलहा रहे थे। पास में ही रामकिशन और उसकी पत्नी जलबाई अपने खेत में काम करने में व्यस्त थे । वे पास के ही गांव दयालपुरा के गरीब किसान थे ।उनके हिस्से में एक खेत था जो उन्हें  पैत्रिक सम्पत्ति  के रुप में मिला था । दोनों हर साल जी तोड़ मेहनत करते परन्तु अभाव और गरीबी में रत्ती भर भी फर्क नहीं पड्ता । रामकिशन निहायत सीधा और मेहनतकश आदमी था । उसकी पत्नी भी उसके कंधे से कंधा मिलाकर काम करने में कतई कम ना थी ।पति के साथ दिन रात काम में खटती परन्तु कभी कोई शिकवा-शिकायत नहीं। जैसे हालात थे उनमें वो दोनों खुश थे । समय का चक्र अपनी अविरल गति से चलता रहा । एक के बाद एक जलबाई ने तीन सन्तानो को जन्म दिया , जिनमें दो बेटे और एक बेटी थी । घर का खर्च भी बढ़ गया सो वे अपने खेतों में काम के अलावा दूसरे के यहां मजदूरी भी कर लेते थे ।

एक बार रामकिशन अचानक ऐसा बीमार पड़ा कि फिर उठा ही नहीं ।लम्बी बीमारी और दवाओ के अभाव में वो परलोक सिधार गया । जलबाई पर तो दुख का जैसे पहाड़ टूट पड़ा ।बेचारी जलबाई चीखती हुई रामकिशन की लाश पर बेहोश हो गई। उसे पता ही नहीं चला कि कब उसकी चूडियां तोड़ दी और कब उसकी मांग का सिन्दूर पोंछ दिया गया। उस समय बड़ा बेटा रमेश सात वर्ष का, छोटा धरमू चार और बेटी रामबाई तीन साल की थी ।

सारे रिश्तेदार और पडौसियो ने दो-तीन दिन जलबाई को समझाया कि आगे इन बच्चों के बारे में सोचे । उसकी उम्र इन्ही के पालन पोषण के लिये बची है । जलबाई ने भी छाती पर पत्थर रखकर अपने बच्चों के पालन – पोषण में लग गई।  वो दिन भर अकेली मेहनत मजदूरी करके बच्चों को जैसे‑तैसे पाल रही थी । तीज- त्यौहार तो जैसे उसके लिये बने ही नहीं थे । दो वक्त़ खाने का ही पूरा नहीं पड़ रहा था तो वार त्यौहार का तो उसके जीवन में कोई अर्थ ही नहीं था । जलबाई ने त्यौहार के समय तो घर से निकलना ही बंद कर दिया था । वह चुपचाप एक कोने में अपने तीनों बच्चों को छाती से चिपकाए रोती रहती । अपनी व्यथा कहे भी तो किससे? ना कोई रिश्तेदार साथ देने को तैयार था और ना ही उसके पास कोई सन्चित पूंजी थी । एक बार उसने मरने की भी ठानी थी । पास ही बाणगंगा के किनारे पहुंच भी गई , परन्तु दूसरे ही पल तीनों बच्चों की बेड़ी ने उसके कदम बलात वहीं रोक दिए। जलबाई सिसक उठी, वह उल्टे पांव गांव की ओर भागी और तीनों बच्चों से आ लिपटी ।

सर्दियो की गुलाबी धूप का आनंद लेने आस पडौस के बच्चे रमेश के घर के बगल में बैठे हुए थे । अक्सर गांव के बच्चे सुबह-सुबह इन दिनों में बाजरे की रोटी पर ढेर सारा लोनी घी और गुड़ रखकर धूप में आकर उसका आनंद लेते रहते थे । रमेश उन्हें टुकर-टुकर देखता रहता । कई बार उसने मां से भी गुड़ मांगा परन्तु सब व्यर्थ ।

एक रोज़ रमेश खेलते -खेलते दलित बस्ती में पहुंच गया । वहां उसकी उम्र के कई बच्चे खेल रहे थे । वो भी उनके साथ खेलने लग गया । खेल-खेल में मगन नाम के एक दलित बच्चे से उसकी गहरी दोस्ती हो गई । मगन उसे अपने घर ले गया और पूछा ” रमेश गुड़ रोटी खाओगे?” रमेश ने तुरंत हां कर दी । मगन ने छींके से रोटी निकाली और हन्डिया से गुड़ के दो ड़ले निकाले और दोनों खाने में मशगूल हो गये । रमेश को उनमें जैसा स्वाद आ रहा था वैसा स्वाद उसने अब तक की ज़िंदगी में कभी चखा नहीं था । ये तथाकथित ऊंची जाति के लोग गांव में आज भी दलितो के साथ खाना तो दूर , उन्हें अपन पास भी नहीं बैठने देते । वाकई बच्चों में ईश्वर का वास होता है । उनके लिये सभी एक समान है। उनके निर्विकार मन में ना तो ऊंच नीच जैसी खोखली दुर्भावना होती है और ना ही छूआछूत जैसा घृणित शब्द । खेलकर जब सायंकाल रमेश घर आया तो जलबाई ने उससे पूछा-”क्यों रे , आज दिनभर कहां था? सुबह से तूने खाना भी नहीं खाया ।”

”मां आज में गांव के पिछवाड़े जो घर हैं वहां खेलने चला गया था । वहां मगन नाम का एक मेरा दोस्त भी बन गया, उसी ने मुझे जी भर के गुड़ -रोटी खिलाई।”रमेश ने निश्छल भाव से कहा ।

”नासपीटे, तू हमें जाति से बाहर करवाएगा। तुझे वहां किसी ने देखा तो नहीं था। आज तूने मेरी नाक कटवा दी ।” कहते कहते जलबाई उसे बेतहाशा पीटे जा रही थी । उसे इतना मारा कि रमेश बेहोश हो खाट पर गिर गया । रमेश की यह हालत देख जलबाई पिघल गई ।उसने रमेश के मुंह पर पानी के छींटे मारे । रमेश ने धीरे‑धीरे आंखें खोल दी और कहने लगा-” मां आज के बाद में वहां नहीं जाऊंगा, ना ही तुझसे कभी गुड़ रोटी मांगूगा ।”

सुनते ही जलबाई ने रमेश को छाती से चिपका लिया और फफक – फफक कर रो पड़ी। अब उसे रमेश के कृत्य से अधिक अपनी गरीबी पर गुस्सा आ रहा था। गरीब आदमी दूसरों के बजाय अपने आप पर अधिक गुस्सा करता है । जलबाई ने कमर से अपनी लूगड़ी का पल्लू निकाला, उसकी गांठ में दो रुपये रखे थे । जो उसे कल ही  दिन भर की मजदूरी की एवज में मिले थे । जलबाई ने वो दो रुपये इसीलिये बचा कर रखे थे कि उसको अपने पति का श्राध्द करना था । जलबाई ने मन मसोस कर सोच लिया कि जब जीवित व्यक्ति ही भूख के कारण कुमार्ग पर जाने को आमादा हो जाए तो मरे हुए की कौन परवाह करता है । मुझे कोई श्राध्द नहीं करना। अपने जीवित बच्चों का पेट पहले है। जलबाई सीधी बनिए की दुकान पर गई । उसने दो रुपये का सेर भर गुड़ खरीद लिया और घर आकर बाजरे का ढेर सारा मलीदा बनाया । शाम को जब बच्चों ने भरपेट मलीदा खाया तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं था । रमेश की दिनभर की पिटाई का दर्द मलीदे के स्वाद में ना जाने कहां खो गया उसे पता ही नहीं चला । अब वह खुश था । जलबाई तीनों बच्चों को निहार रही थी । आज वे इतने खुश थे मानो उन्हें तीनों लोको का राज्य मिल गया हो ।

एक दिन जलबाई का भाई फत्तू अचानक आ गया । दोनों भाई बहन जी भर गले मिले।

फत्तू ने कहा कि जीजी अब तू भूआ बन गई है । मेरे घर पुत्र का जन्म हुआ है सो तुम्हें लेने आया हूं। वहां छोछक की रस्म करनी है । जलबाई बहुत खुश हुई और अपने तीनों बच्चों के साथ अपने पीहर चली गई ।

सात आठ दिन जब पीहर में रहकर जलबाई वापिस आने लगी तो फत्तू ने कहा-” जीजी मेरे पास यह झोटी (बिन ब्याही नई भैंस) है, इसे तुझे बिदा में देता हूं। बच्चे भी इतने कमजोर हो रहे हैं, इन्हे भी दो वक्त़ दूध-दही मिल जायेगा । यह थोड़े ही दिनों में हरी होने वाली है ।” जलबाई के चेहरे पर खुशी की लहर दोड़ गई। तीनों बच्चों को भी फत्तु ने नए कपड़े दिए। बच्चे इन्हें देख-देख कर आनंदित हो रहे थे । जलबाई भैंस को लेकर वहां से चल दी । रास्ते में भैंस को देख देख कर बच्चे खुशी से चहक रहे थे । रमेश ने कहा-” मां अब इसको चराने की जिम्मेदारी मेरी है।” इतना सुनकर दोनों बच्चे रूठने लगे । नहीं हम चरायेंगे इसे और रोज़ रोज़ खूब दूध घी खाएंगे । जलबाई ने कहा-” तुम तीनों ही खूब चराना इसे तभी तो तुम्हें यह ढेर सारा दूध देगी ।” सुनकर बच्चे आने वाले कल की दुनियां के रंगीन सपने बुनने लगे। रमेश ने कहा -” मां देखो इसकी आंखें कितनी सुंदर है । आज से इसका नाम कन्जी है।”

” ठीक है जो तुम्हारे मन में आये रखलो , लेकिन दूध-घी उसे ही ज्य़ादा मिलेगा जो इसका सबसे ज्य़ादा ध्यान रखेगा ।” खुशी के उद्देग और भावी सपनो के अतिरेक में पता ही नहीं चला बातों ही बातों में कब गांव आ गया । रमेश ने घर के आगे वाले नीम के पेड़ के नीचे जगह साफ कर एक खूंटा गाड़ा और कन्जी का निवास स्थान तैयार कर दिया । जलबाई कुएं से पानी भर लाई और परात में ड़ालकर कन्जी को पानी पिलाया गया । धरमू कहां पीछे रहने वाला था उसने कन्जी की पूंछ में फंसे जंगली कांटो को पलक झपकते ही निकाल फेंका । यह सब देखकर रामबाई रूठ गई और कहने लगी मुझे कोई कुछ करने ही नहीं दे रहा । सुनकर जलबाई ने कहा जा तू घरमें से थोड़ा आटा ले आ, इसको सानी करनी है । रामबाई कटोरे में आटा भर लाई । कन्जी टुकुर -टुकुर तीनों बच्चों को देख रही थी। अब तो आये दिन तीनों बच्चों में यही होड़ लगी रहती कि कौन ज्य़ादा सेवा करता है। कन्जी भी उनसे बहुत हिल मिल गई थी । जब भी वो उसके पास आते , कन्जी उन्हें जीभ से चाटने लग जाती ।

दो तीन महीने का समय बीत गया । एक दिन जलबाई खेतों पर काम करने गई थी । घर पर तीनों बच्चे थे जो कन्जी की सेवा- सुश्रूषा में लगे थे। रमेश ने सानी कर दी और धरमू खेतों से हरी हरी घास बीन कर उसके आगे ड़ाल रहा था । परन्तु आज ना जाने क्यों कन्जी कुछ भी नहीं खा रही थी । अचानक वो जोर‑जोर से रंभाने लगी । खड़ी होकर बार बार बेचेनी से खूंटे के चक्कर लगाने लगी । बार पेशाब किये जा रही थी । तीनों बच्चे यह देखकर घबरा गये । रमेश तुरंत भागकर खेत पर अपनी मां के पास पहुंचा और उसने सारी बात अपनी मां को बताई । जलबाई दौड़ी‑दौड़ी घर आई और उसे यह समझते देर ना लगी कि कन्जी उठान पर है । तीनों बच्चों को घर पर ही छोड़कर पास के गांव में कन्जी को हरी करवा लाई। कन्जी को लाकर खूंटे से बांध दिया । अब वो शान्त खड़ी थी। रमेश ने आते ही मां से पूछा-” मां कन्जी को क्या हो गया था ?” सुनकर जलबाई ने कहा -” बेटा तुम्हारी कन्जी के पेट में अब एक नन्हा सा बच्चा आ गया है वो आठ नौ महीने बाद बाहर आ जायेगा फिर कन्जी दूध देना शुरू कर देगी ।” सुनकर तीनों बच्चों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा । अब तो वे दुगने मनोवेग से कन्जी की सेवा में लग गये । ऐसा कोई दिन नहीं था जब तीनों बच्चों में कन्जी के दूध-दही की बात पर झगड़ा न हुआ हो । सबसे ज्य़ादा रामबाई रुठती थी । वो हमेंशा यही कहती -” मैं तो सुबह जल्दी उठा करुंगी और जब मा दही बिलोयगी तो वहीं बैठकर लोनी घी का बड़ा सा ड़ला लेकर रोटी के साथ जी भरकर खाया करुंगी ।” इतनी बात सुनकर रमेश उसे चिढाने की नियत से कहता -” मैं तो शाम को ही सारा दूध पीजाया करूंगा फिर तू सुबह घी कहां से खायेगी ।” इतना सुनते ही रामबाई जोर जोरसे रोने लगती और मां से शिकायत करती । समझाते हुए मां कहती कि कन्जी इतना सारा दूध दही देगी की तुम सबके खाने के बाद भी ढेर सारा घी भी बचेगा और छाछ भी बचेगी । तब जाकर रामबाई का विलाप खतम होता । दिन महीने पंख लगाकर उड़ते गये और कन्जी के ब्यावन का आख़िरी महीना भी आ गया ।

प्रात:काल नीम के पेड़ पर पक्षियों का कलरव बढ गया था। रात को हल्की बारिश भी हुई थी सो हवा में उसकी शीतलता व्याप्त थी । मंद‑मंद हवा चल रही थी । तीनों बच्चे घर के आगे ही खेल रहे थे । अचानक कन्जी इधर उधर चक्कर काटने लगी । जलबाई ने देखा की कन्जी ब्याहने वाली है। उसने पडौस के भगवान्या को बुलाया जो भैंस के मामले में काफ़ी अनुभवी आदमी था । थोड़ी देर बाद भगवान्या ने मसक्कत कर कन्जी को प्रसव से निवृत कर दिया । कन्जी ने एक शानदार नन्ही सी पडिया को जन्म दिया था । छोटी पढिया बार -बार उठने की कोशिस कर रही थी । उसकी बाल सुलभ क्रीड़ा देखकर जलबाई के तीनों बच्चे खुश हो रहे थे ।कन्जी अपने बच्चे को बड़े प्यार से चाट रही थी । रामबाई कन्जी के सिर को खुजला रही थी । आख़िरकार तीनों बच्चों ने जो ढेर सारे सपने देखे थे आज वे पूरे होने की कगार पर थे । यह सारा माज़रा चल ही रहा था की अचानक रमेश का फूफा कैलाशी वहां आ गया। रमेश ने उसके पैर छुए और बड़े उत्साह से बताया कि फूफा जी हमारी कन्जी ने एक प्यारा सा बच्चा दिया है । कैलाशी ने कन्जी को हसरत भरी नज़रों से देखा और उसकी नजर उस पर थोड़ी देर के लिये स्थिर हो गई ।

जब से रमेश के पिता रामकिशन की मौत हुई है कैलाशी ने एक बार भी आकर इनके सुख-दुख के बारे में नहीं पूछा । जब सब लोग कन्जी के ब्यावन से निवृत हो गये तो उसने जलबाई को अपने पास बुलाया और कहने लगा -”देख जलबाई, जिसका लिया है उसका देना तो पड़ता ही है । अब तक मैं रिश्तेदारी और तुम्हारी हालत की वजह से चुप था ।”

सुनकर जलबाई चोंकी -” मगर आप यह सब मुझ से क्यों कह रहे हैं? मैं कुछ समझी नहीं।”

” क्या रामकिशन ने मरते वक्त़ तुम्हें कर्जे के बारे में कुछ नहीं बताया ।”कैलाशी ने बीड़ी सुलगाते हुए कहा ।

”नहीं, ऐसी तो कोई बात नहीं बताई । हमें तो कर्जे की कभी जरूरत भी नहीं पड़ी।” जलबाई ने चेहरे का पसीना पोंछते हुए कहा ।

” देख जलबाई, रामकिशन ने मरने से पांच महीने पहले मुझसे तीन सौ रुपये उधार लिये थे। उसने कहा था कि खाद, बीज और कुछ अन्य जरूरत के लिये रुपये चाहिए।” कहकर कैलाशी ने मुंह से बीड़ी का बेतरतीब धुंआ छोड़ा ।

” नहीं, वे रुपया लेते तो मुझे जरूर बताते । वे कोई भी बात मुझसे कभी नहीं छिपाते थे।” जलबाई के चेहरे पर हवाईयां उड़ऩे लगी। उसने साफ कह दिया कि की उन्होंने किसी से कोई उधार नहीं लिया था । हमने तो सदा अभाव में ही ज़िंदगी काटी है। कई रात हम भूखे भी सो गये लेकिन किसी से कर्ज नहीं लिया । सुनकर कैलाशी को क्रोध आ गया और उसने चीख‑चीख कर आस-पडौस के लोगों को इकट्ठा कर लिया । देखते ही देखते वहां काफ़ी भीड़ हो गई । कैलाशी सबके सामने चिल्ला‑चिल्लाकर कह रहा था -” इस जमाने में किसी की मदद करना तो सबसे बड़ा पाप है ।”

गांव का पटैल भूरजी भी वहां आ पहुंचा ।

”क्यों रिश्तेदार कैलाशी यह क्या तमाशा लगा रखा है। सारा मामला बयान करो?” भूरजी ने खाट पर बैठते हुए कहा ।

”पटैल जी , दरअसल रामकिशन ने मरने से पांच महीने पहले खाद, बीज और अन्य घरेलू कामों के लिये मुझसे एक हजार रुपये उधार लिये थे । उसने इन रुपयो को छह महीने में लोटाने को कहा था मगर उसकी अचानक मौत हो गई । इस कारण मैं भी चुप रहा ,आख़िर वो मेरा साला था ।मैंने यही सोचा कि साल दो साल में जब सब कुछ ठीक- ठाक हो जायेगा तो जलबाई से मांग लूंगा । मैंने रिश्तेदारी के लिहाज से कभी बीच में तकाज़ा नहीं किया । अब उस बात को चार साल हो गये । आख़िर मैं भी बाल बच्चे दार आदमी हूं ।  जब मैंने इन रुपयो को जलबाई से मांगा तो यह देने से साफ मुकर गई ।बताओ पंचो अब मैं कहां जाऊं? क्या मैंने इनकी मदद करके कोई पाप किया था?” कहकर कैलाशी अपनी आंखों से आंसू बहाने लगा ।

सारी बात सुनकर भूरजी ने जलबाई से कहा-” क्यों री जलबाई, तू क्या कहती है इस मामले में?”

” पंचो तुम तो सदा से हमें देखते आ रहे हो, मेरे पति ने कितने दुख उठाए थे फिर भी किसी से कोड़ी भी उधार नहीं मांगी। हम भूखे रहे, लाख दुख झेले फिर भी हमने किसी गांव वाले से या रिश्तेदार से कभी कर्ज नहीं मांगा ।आप सब इस बात के गवाह हैं ।” कहते‑कहते जलबाई फफक‑फफक कर रोने लगी ।

भीड़ में से गांव का सुरजन बोला-” इसमें कोई शक नहीं कि जब तक रामकिशन ज़िंदा था वो अपनी मेहनत का खाता था । उसके मरने के बाद जलबाई ने लाख दुख झेले मगर कभी किसी से पाई भी उधार नहीं ली । रही बात खाद बीज की तो रामकिशन के हिस्से में तो ले-देकर एक ही खेत है उसके लिये एक हजार रुपये की जरूरत कहां से पड़ गई। मैं इससे बिलकुल भी सहमत नहीं हूं कि रामकिशन ने इतनी बड़ी रकम उधार ली  । यदि रकम उधार  लेता तो जलबाई को जरूर बताता।” सुरजन की बात का कई लोगों ने समर्थन किया । इतना सुनते ही कैलाशी दहाड़े मारकर रोने लगा-” ठीक है मैं तो चला जाऊंगा लेकिन याद रखना बह-बेटी का रुपया आज तक किसी को हजम नहीं हुआ है।”

”तू पहले यह तो बता कि रुपया देते समय कोई गवाह था और कोई लिखा पढी भी की थी ।” भूरजी ने पूछा ।

सुनकर कैलाशी पुन भीड़ के बीच आ गया , अपनी ज़ेब से उसने एक कागज़ निकाला और कहने लगा-” पंचो रामकिशन मेरा साला था । मैं कोई लेन-देन का धंधा तो करता नहीं की किसी गवाह के सामने रुपये गिनूं। मैंने उसे एक हजार रुपये अकेले में ही दिए थे। परन्तु रामकिशन ईमानदार आदमी था । उसे मौत का  पूर्वाभास हो गया था। उसने ज़ेब में रुपये रखकर मुझसे कहा था कि जीजा यह रुपये पैसे का मामला है सो मैं पहले से ही यह कागज़ लिखवा लाया हूं और इस पर मैंने अंगूठा भी लगा दिया है ।” कहकर कैलाशी ने वो कागज़ भूरजी के हाथों में सोंप दिया । गांव के राजू मास्टर को बुलाया गया । उसने सबके सामने वो कागज़ पढ़ा और यह सुनिश्चित कर दिया कि रामकिशन ने एक हजार रुपये उधार लिये थे। सारी बात सुनकर भूरजी ने जलबाई से कहा-

” देख जलबाई यह तो खुलासा हो ही गया है कि रुपये उधार लिये गए थे । अब तू यह बता इसे कैसे चुकाएगी?”

”पटेल जी मेरे पास तो फूटी कोड़ी भी नहीं है। मैं कैसे बच्चों का पालन पोषण कर रही हूं, मैं ही जानती हूं। हम अभी मरे नहीं हैं, यदि मेरे पति ने रुपये लिए हैं तो मैं जीते जी चुका दूंगी मगर अभी मैं इस हालत में नहीं हूं॥” जलबाई की आंखें अविरल बहे जा रही थीं । मौका देखकर कैलाशी बोला-

”पंचो मुझे जलबाई पर अब बिलकुल भी विश्वास नहीं रहा । यह तो आपकी मेंहरबानी है जिसके कारण कम से कम इसने रुपये लेने की बात तो कबूल ली । कल के जाये यह पलट भी सकती है । जो भी हो मेरा आज ही हिसाब करवा दो। अब वे रुपये ब्याज सहित काफी बढ गए हैं ।” कहकर कौलाशी ने भूरजी के पांव पकड़ लिये।

”लेकिन इनकी हालत तो तुमसे छिपी नहीं है । यह कहां से इतनी बड़ी रकम लाएगी।” भूरजी ने कैलाशी से कहा ।

” देखिए पटेल जी, मुझे चाहे घाटा रहे या फ़ायदा, जब हिसाब ही करना है तो आज ही मुझे इसकी भैंस दिलवा दीजे । उससे ही मैं भरपाई कर लूंगा ।” कहकर कैलाशी ने कन्जी की ओर कनखियों से देखा ।

गांव के लोग खासकर लड़की के रुपये को पाप समझते हैं। कैलाशी की पत्नी इसी गांव की लड़की थी सो अधिकतर लोगों ने कहा कि यह भैंस देकर इसका टन्टा तोड़ दो । चारो ओर से यही आवाज़ आ रही थी । जलबाई ने पंच-पटेलों के आगे लाख गुहार लगाई मगर किसी ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया । धीरे-धीरे भीड़ वहां से हट गई । वहां रह गये तो केवल कैलाशी और जलबाई के बच्चे। कैलाशी ने कन्जी को खूटे से खोला । नवजात पडिया को उसने अपनी गोद में उठा लिया । यह देखते ही रमेश कन्जी की गरदन से लिपट गया। धरमू और रामबाई दोनों कन्जी के गले की रस्सी को कैलाशी के हाथों से छुड़ाने लगे । तीनों बच्चों का रूदन इतना तीव्र था कि गांव के दूसरे छोर तक उनकी आवाज़ जा रही थी। कैलाशी ने धरमू और रामबाई को धक्का देकर एक तरफ पटक दिया और कन्जी की गरदन से रमेश को अलग करने लगा ।जलबाई रोती हुई आई और उसने रमेश को गरदन से अलग कर घर की ओर धकेलती ले गई । कैलाशी कन्जी को खींचे ले जा रहा था । थोड़ी दूर तक तो कन्जी अपने नवजात के मोह में कैलाशी के पीछे जाती रही । उधर रमेश भी मां के हाथो से छूटकर कन्जी की तरफ भागने को उतारु हो रहा था । सारा घर बच्चों के करुण रुदन से चीत्कार उठा। रुदन का कोलाहल  थम नहीं रहा था । रमेश को  जलबाई ने पकड़ रखा था , परन्तु रामबाई का रो-रो कर बुरा हाल था । धरमू रामबाई को चुप करवाने की कोशिस कर रहा था, मगर रामबाई का विलाप तेजी से बढ़ रहा था ।

पशु मूक जरूर होता है परन्तु भावनात्मक वेग तो उसके ह्रदय में भी मनुष्‍य से कम नहीं होता । कन्जी ने अपने नवजात का मोह छोड़कर गरदन से एक जोरदार झटका दिया और कैलाशी की पकड़ से छूटकर जोर से भाग निकली । वो सीधी रमेश के पास आकर उसके माथे को चाटने लगी । रमेश भी जलबाई की बांहों से अलग हो कन्जी की गरदन से लिपट गया ।

गुस्से में निर्दयी कैलाशी ने कन्जी के बच्चे को एक तरफ पटका और पास में पड़े बड़ीते से एक मोटा सा लट्ठ निकालकर कन्जी को निर्ममता से मारने लगा । इस दृश्य को देखकर रामबाई बेहोश हो गई और ड़र के मारे धरमू अपनी मां से जा चिपटा। रमेश को भी झिंझोड़कर एक ओर धकेल दिया । कन्जी को लेकर कैलाशी वहां से चला गया ।रमेश ने एक बार फिर कातर दृष्‍टि से कन्जी के खोजों (पदचिन्हों)पर ड़ाली। थोड़ी देर वो उन खोजों को देखता-देखता आगे बढ़ता गया । उसे रह रहकर उन खोजो में कभी कन्जी तो कभी उसका नन्हा सा नवजात बच्चा नज़र आ रहा था । हवा का एक तेज झोंका आया और कन्जी के खोजो को धूमिल कर गया । रमेश की आंखें पथरा गई ।हवा के उस तेज झोंके के साथ ही उसकी दूध की लालसा भी हवा के वेग में बह गई ।उसे लगा जैसे उसका दिमाग फटकर बाहर आ जायेगा । वह अचानक बेहोश होकर ज़मीन पर गिर पड़ा । बेहोशी की हालत में रमेश बड़बड़ाए जा रहा था – ”मां मेरी रोटी पर भी लोनी घी रख दो। मां मेरे कटोरे में सबसे ज्य़ादा दूध ड़ाल दो । ”सुनकर जलबाई को लग रहा था जैसे उसके शरीर से किसी ने सारा खून निकाल लिया हो। निढाल सी होकर रोते -रोते रमेश को उसने अपनी बांहों में भर लिया। उसकी आंखों से आंसुओं की तेज धार बह रही थी । रमेश के कटोरे में जलबाई दूध तो नहीं ड़ाल सकी परन्तु जलबाई के आंसू और  रमेश की सिसकियों की गति जरुर तेज होती जा रही थी ।

 


लेखक जीवन परिचय

 Vijay Singh Meenaनाम:- विजय सिंह मीणा (Vijay Singh Meena)

जन्म तिथि: – 01 जुलाई 1965

जन्म स्थान: ग्राम-जटवाड़ा, तहसील-महवा, जिला-दौसा, राजस्थान

शिक्षा: – एम. ए. (हिंदी साहित्य), राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर

सेवाएं: – केन्द्रीय अनुवाद ब्यूरो, नई दिल्ली एवं केंद्रीय हिंदी निदेशालय, नई दिल्ली मे पदासीन रहे।

संप्रति:- उप निदेशक (राजभाषा), विधि कार्य विभाग, विधि एवं न्याय मंत्रालय, शास्त्री भवन, नई दिल्ली ।

प्रकाशित रचनायें: – विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मे कहानी, कविता व लेख प्रकाशित तथा विभिन्न साहित्यिक व

सम-सामयिक विषयों पर आकाशवाणी एवम दूरदर्शन से वार्तायें प्रसारित ।

(1) सिसकियां — — – पहला कहानी संग्रह

(2) रहना नहीं देश बिराना है … दूसरा कहानी संग्रह

अभिरूचियाँ: – प्राचीन ऐतिहासिक एवं पुरातत्व महत्त्व के स्मारकों एवं स्थलों का भ्रमण.

संपर्क:- – ई-30-एफ ,जी – 8 एरिया , वाटिका अपार्टमेट ,एम आई जी फ्लेट,

मायापुरी , नई दिल्ली 110078

 

 

New Hindi Story: दूध की लालसा – कहानी (विजय सिंह मीणा)
5 (100%) 1 vote

Leave a comment

Leave a Reply