हे सत्य सनातनहे अनंतहे शिव भोलेहे जगत-कंत हे शक्ति नियंतासंघारकहे डमरू,त्रिशूलके धारक हे महादेवहे शिवा पतितव ध्यान मग्नसब योगी-यती ले अतुल भक्तिविश्वास धारमैं रहा आजतुझको पुकार मम् वंदन कोस्वीकार करोइस धरती केसंताप हरो… ***********         < p dir=”ltr”>-विश्वम्भर पाण्डेय ‘व्यग्र’           गंगापुर सिटी (राज.) वंदन Poem by विश्वम्भर पाण्डेय ‘व्यग्र’Rate this post

पवित्र तीर्थ तथा धाम की जानकारी किसी :- किसी साधक ऋषि जी ने किसी स्थान या जलाशय पर बैठ कर साधना की या अपनी आध्यात्मिक शक्ति का प्रदर्शन किया। वह अपनी भक्ति कमाई करके साथ ले गया तथा अपने ईष्ट लोक को प्राप्त हुआ। उस साधना स्थल का बाद में तीर्थ या धाम नाम पड़ा। अब

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कबीर साहेब द्वारा विभीषण तथा मंदोदरी को शरण में लेना :- ??? परमेश्वर मुनिन्द्र अनल अर्थात् नल तथा अनील अर्थात् नील को शरण में लेने के उपरान्त श्री लंका में गए। वहाँ पर एक परम भक्त चन्द्रविजय जी का सोलह सदस्यों का पुण्य परिवार रहता था। वह भाट जाति में उत्पन्न पुण्यकर्मी प्राणी थे। परमेश्वर मुनिन्द्र

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पवित्र गीता का ज्ञान श्री कृष्ण जी ने नही दिया काल ने दिया था। पवित्र गीता जी के ज्ञान को उस समय बोला गया था जब महाभारत का युद्ध होने जा रहा था।अर्जुन ने युद्ध करने से इन्कार कर दिया था। युद्ध क्यों हो रहा था? इस युद्ध को धर्मयुद्ध की संज्ञा भी नहीं दी

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गुरु ते अधिक न कोई ठहरायी। मोक्षपंथ नहिं गुरु बिनु पाई।। राम कृष्ण बड़ तिहुँपुर राजा। तिन गुरु बंदि कीन्ह निज काजा।। गेही भक्ति सतगुरु की करहीं। आदि नाम निज हृदय धरहीं।। गुरु चरणन से ध्यान लगावै। अंत कपट गुरु से ना लावै।। गुरु सेवा में फल सर्बस आवै। गुरु विमुख नर पार न पावै।।

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कबीर परमेश्वर की अमृतवाणी कबीर, जिन हरि की चोरी करी, गये राम गुण भूल । ते विधना बागुल किये, रहे उर्धमूख झूल ।। कबीर परमेश्वर जी कहते है कि:- जो लोग मनुष्य जन्म पाकर सत् भक्ति नही करते वे बार बार गर्भवाश में आकर उलटे लटकते है तथा ऐसे जीवों के रुप में जन्म लेते

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श्रीमद्भगवद्गीता जी का अनमोल यथार्थ पुर्ण ब्रम्ह ज्ञान (गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित)  मैं सबको जानता हूँ, मुझे कोई नहीं जानता (अध्याय 7 मंत्र 26)  मै निराकार रहता हूँ (अध्याय 9 मंत्र 4 )  मैं अदृश्य/निराकार रहता हूँ (अध्याय 6 मंत्र 30) निराकार क्यो रहता है इसकी वजह नहीं बताया सिर्फ अनुत्तम/घटिया भाव काहा है,

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संत कबीर के दोहे, हिन्दू और मुस्लमान के धार्मिक विचारो पर व्याख्यान जो तूं ब्रह्मण , ब्राह्मणी का जाया ! आन बाट काहे नहीं आया !! – कबीर (अर्थ- अपने आप को ब्राह्मण होने पर गर्व करने वाले ज़रा यह तो बताओ की जो तुम अपने आप की महान कहते तो फिर तुम किसी अन्य

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कबीर, दर्शन साधु का, करत न कीजै कानि | ज्यो उद्धम से लक्ष्मी, आलस मन से हानि।। कबीर, सोई दिन भला, जा दिन साधु मिलाय। अंक भरे भरि भेटिये, पाप शरीरा जाय।। मात-पिता सुत स्त्री, आलस बन्धु कानि। साधु दर्श को जब चलै, ये अटकावै आनि।। साधु भूखा भाव का, धन का भूखा नाहि। धन

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साहेब कबीर आजा आत्मा तोहे पुकारती । तेरे हाथ मेँ चाबी सतगुरु, सतलोक द्वार की ।।(1) 22 लाख वर्ष तप किना, इक तपस्वी कर्ण कहाया , तप से राज राज मद मानम , नर्क ठिकाणा पाया । सिर धुन धुन के पछताया , या थी बाजी हार की ।।( 2 ) साहेब कबीर आजा ,

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