कबीर साहेब द्वारा विभीषण तथा मंदोदरी को शरण में लेना :- ??? परमेश्वर मुनिन्द्र अनल अर्थात् नल तथा अनील अर्थात् नील को शरण में लेने के उपरान्त श्री लंका में गए। वहाँ पर एक परम भक्त चन्द्रविजय जी का सोलह सदस्यों का पुण्य परिवार रहता था। वह भाट जाति में उत्पन्न पुण्यकर्मी प्राणी थे। परमेश्वर मुनिन्द्र

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गुरु ते अधिक न कोई ठहरायी। मोक्षपंथ नहिं गुरु बिनु पाई।। राम कृष्ण बड़ तिहुँपुर राजा। तिन गुरु बंदि कीन्ह निज काजा।। गेही भक्ति सतगुरु की करहीं। आदि नाम निज हृदय धरहीं।। गुरु चरणन से ध्यान लगावै। अंत कपट गुरु से ना लावै।। गुरु सेवा में फल सर्बस आवै। गुरु विमुख नर पार न पावै।।

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कबीर परमेश्वर की अमृतवाणी कबीर, जिन हरि की चोरी करी, गये राम गुण भूल । ते विधना बागुल किये, रहे उर्धमूख झूल ।। कबीर परमेश्वर जी कहते है कि:- जो लोग मनुष्य जन्म पाकर सत् भक्ति नही करते वे बार बार गर्भवाश में आकर उलटे लटकते है तथा ऐसे जीवों के रुप में जन्म लेते

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संत कबीर के दोहे, हिन्दू और मुस्लमान के धार्मिक विचारो पर व्याख्यान जो तूं ब्रह्मण , ब्राह्मणी का जाया ! आन बाट काहे नहीं आया !! – कबीर (अर्थ- अपने आप को ब्राह्मण होने पर गर्व करने वाले ज़रा यह तो बताओ की जो तुम अपने आप की महान कहते तो फिर तुम किसी अन्य

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कबीर, दर्शन साधु का, करत न कीजै कानि | ज्यो उद्धम से लक्ष्मी, आलस मन से हानि।। कबीर, सोई दिन भला, जा दिन साधु मिलाय। अंक भरे भरि भेटिये, पाप शरीरा जाय।। मात-पिता सुत स्त्री, आलस बन्धु कानि। साधु दर्श को जब चलै, ये अटकावै आनि।। साधु भूखा भाव का, धन का भूखा नाहि। धन

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साहेब कबीर आजा आत्मा तोहे पुकारती । तेरे हाथ मेँ चाबी सतगुरु, सतलोक द्वार की ।।(1) 22 लाख वर्ष तप किना, इक तपस्वी कर्ण कहाया , तप से राज राज मद मानम , नर्क ठिकाणा पाया । सिर धुन धुन के पछताया , या थी बाजी हार की ।।( 2 ) साहेब कबीर आजा ,

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