गुरु ते अधिक न कोई ठहरायी।
मोक्षपंथ नहिं गुरु बिनु पाई।।
राम कृष्ण बड़ तिहुँपुर राजा।
तिन गुरु बंदि कीन्ह निज काजा।।
गेही भक्ति सतगुरु की करहीं।
आदि नाम निज हृदय धरहीं।।
गुरु चरणन से ध्यान लगावै।
अंत कपट गुरु से ना लावै।।
गुरु सेवा में फल सर्बस आवै।
गुरु विमुख नर पार न पावै।।
गुरु वचन निश्चय कर मानै।
पूरे गुरु की सेवा ठानै।।
गुरुकी शरणा लीजै भाई।
जाते जीव नरक नहीं जाई।
गुरु कृपा कटे यम फांसी।
विलम्ब ने होय मिले अविनाशी।।
गुरु बिनु काहु न पाया ज्ञाना।
ज्यों थोथा भुस छड़े किसाना।।
तीर्थ व्रत अरू सब पूजा।
गुरु बिन दाता और न दूजा।।
नौ नाथ चैरासी सिद्धा।
गुरु के चरण सेवे गोविन्दा।।
गुरु बिन प्रेत जन्म सब पावै।
वर्ष सहंस्र गरभ सो रहावै।।
गुरु बिन दान पुण्य जो करई।
मिथ्या होय कबहूँ नहीं फलहीं।।
गुरु बिनु भर्म न छूटे भाई।
कोटि उपाय करे चतुराई।
गुरु के मिले कटे दुःख पापा।
जन्म जन्म के मिटें संतापा।
गुरु के चरण सदा चित्त दीजै।
जीवन जन्म सुफल कर लीजै।।
गुरु भगता मम आतम सोई।
वाके हृदय रहूँ समोई।।
अड़सठ तीर्थ भ्रम भ्रम आवे।
सो फल गुरु के चरनों पावे।।
दशवाँ अंश गुरु को दीजै।
जीवन जन्म सफल कर लीजै।।
गुरु बिन होम यज्ञ नहिं कीजे।
गुरु की आज्ञा माहिं रहीजे।।
गुरु सुरतरु सुरधेनु समाना।
पावै चरन मुक्ति परवाना।।
तन मन धन अरपि गुरु सेवै।
होय गलतान उपदेशहिं लेवै।।
सतगुरुकी गति हृदय धारे।
और सकल बकवाद निवारै।।
गुरु के सन्मुख वचन न कहै।
सो शिष्य रहनिगहनि सुख लहै।।
गुरु से शिष्य करै चतुराई।
सेवा हीन नर्क में जाई।।

कबीर परमेश्वर जी द्वारा गुरु महिमा अमृतवाणी
5 (100%) 1 vote

Leave a comment

Leave a Reply