भँवर में सही कश्ती को मुड़ाकर तो देखो बारिश में पैर जमीं पे गड़ाकर तो देखो कुछ भी है मुमकिन अगर ठान लें हम सब हाँथ समानता की ओर बढ़ाकर तो देखो भेदभाव ख़त्म कर अब अपनी बेटी को शिक्षा के शिखर पर चढ़ाकर तो देखो हुनर है इनमे दुनियाँ को बदलने का बेटियों को

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खाली कन्धे हैं इन पर कुछ भार चाहिए बेरोजगार हूँ साहब मुझे रोजगार चाहिए जेब में पैसा नही डिग्री लिए फिरता हूँ दिनो दिन अपनी ही नजरो में गिरता हूँ कामयाबी के घर में खुले किवाड़ चाहिए बेरोजगार हूँ साहब मुझे रोजगार चाहिए। दिन रात एक करके मेहनत बहुत करता हूँ सूखी रोटी खाकर ही

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