मैं कवि… (कविता) —————————– कभी अक्षर की खेती करता कभी वस्त्र शब्दों के बुनता बाग लगाता स्वर-व्यंजन के मात्राओं की कलियां चुनता मैं कवि, कृषक के जैसा करता खेती कविताओं की और कभी बुनकर बन करके ढ़कता आब नर-वनिताओं की भूत-भविष्य-वर्तमान सभी तीनों काल मिले कविता में बर्फ के मानिंद ठंडक मिलती ताप मिलेगा जो

Read More »

हे सत्य सनातनहे अनंतहे शिव भोलेहे जगत-कंत हे शक्ति नियंतासंघारकहे डमरू,त्रिशूलके धारक हे महादेवहे शिवा पतितव ध्यान मग्नसब योगी-यती ले अतुल भक्तिविश्वास धारमैं रहा आजतुझको पुकार मम् वंदन कोस्वीकार करोइस धरती केसंताप हरो… ***********         < p dir=”ltr”>-विश्वम्भर पाण्डेय ‘व्यग्र’           गंगापुर सिटी (राज.) वंदन Poem by विश्वम्भर पाण्डेय ‘व्यग्र’Rate this post