बेटियाँ नसीब कहाँ होती हैं – सचिन अ॰ पाण्डेय

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बेटियाँ नसीब कहाँ होती हैं – सचिन अ॰ पाण्डेय

सभी के मुकद्दर में बेटियाँ नसीब कहाँ होती हैं ? रब के असीम रहमोकरम जिस घर-आँगन पर हों , बेटियाँ तो सिर्फ वहाँ होती हैं । सचिन अ॰ पाण्डेय 0 साहित्य लाइव रंगमंच 2018 :: राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी प्रतियोगिता • पहला पुरस्कार: 5100 रुपए राशि • दूसरा पुरस्कार: 2100 रुपए राशि • तीसरा पुरस्कार:
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अब तुम जो हो – सचिन अ॰ पाण्डेय

अब तुम जो हो, तभी नूर-ए-वफा की बात कहते हैं ! तुम्हारे लबों से बयाँ हुए हर लफ़्ज़ पर इरशाद कहते हैं !! इस हरफ़नमौला को कहाँ फिक्र इस जमाने की ? हम तो तुम्हें ही मुकद्दर, तुम्ही को मुराद-ए-हयात कहते हैं सचिन अ॰ पाण्डेय मुंबई,महाराष्ट्र 0 अपने बिज़नेस को दें एक नई पहचान! आज
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आग के दरिया-सा दहकना छोड़ देता ये दिल – सचिन अ. पाण्डेय

काश इस कदर न आँखें मिलाई होती मुझसे एक रोज, तो तेरे पलभर के दीदार को तरसना छोड़ देता ये दिल ! काश न तेरे प्यार की खुशबू आई होती मेरी ओर, तो खिली हुई बगिया-सा महकना छोड़ देता ये दिल !! काश न यूँ तेरी बातों का असर छाया होता मुझपर, तो तेरे हर
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ऐ मेरी हुस्न-ए-मल्लिका, मुझे तू उल्फ़त का जाम दे दे ! – सचिन अ॰ पाण्डेय

ऐ मेरी हुस्न-ए-मल्लिका, मुझे तू उल्फ़त का जाम दे दे, हसीन तो मिलते हैं कई राह-ए-ज़िंदगी में,मगर तुझे ही चाहूँ उम्रभर मैं, ऐसा मुझे कोई पैगाम दे दे !! हर दिन हो होली और हर रात दिवाली हो, यूँ मेरे दामन में तू अपनी सुबहो-शाम दे दे !! गुमनाम हो जाऊँ तेरी दीवानगी में एक
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तुम हमसे दूर हो, हमारी यादों से नहीं ! – सचिन अ॰ पाण्डेय

तुम हमसे दूर हो, हमारी यादों से नहीं ! खेल सकती हो ज़िंदगी से, हमारे जज़्बातों से नहीं !! रुख न करो दिन में मगर रूठो यूँ बहारों भरी रातों से नहीं ! कत्ल कर दो इस जिस्म का मगर कभी दूर होना यूँ रूहानी-साँसों से नहीं !! सचिन अ॰ पाण्डेय 0 साहित्य लाइव रंगमंच
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हबीब नसीब न हो ! – सचिन अ॰ पाण्डेय

वो आशिकी ही कैसी, जिसमें दिल-नशीं दिलबर करीब न हो ! और वो खुशनसीबी ही कैसी, जिसमें हबीब नसीब न हो !! -सचिन अ॰ पाण्डेय 0 साहित्य लाइव रंगमंच 2018 :: राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी प्रतियोगिता • पहला पुरस्कार: 5100 रुपए राशि • दूसरा पुरस्कार: 2100 रुपए राशि • तीसरा पुरस्कार: 1100 रुपए राशि &
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मौसम बड़ा बेईमान! – सचिन अ. पाण्डेय

हर्षित हुआ राष्ट्र का किसान, जो है देश का अभिमान; है ऋतुओं की शान, मौसम बड़ा बेईमान। ग्रीष्म से मुक्त कराता लाया जान-में-जान, जल से भरे बगीचे-रान; खुशियाँ है जीत समान, मौसम बड़ा बेईमान। नाचे बाल-बालाएँ उठाए सीना तान, जैसे हो कोई कीर्तिमान; हरियाली से बढ़ा पर्यावरण का मान, मौसम बड़ा बेईमान। आनंदभोर सभी जीव-जान,
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शायरी – सचिन अ॰ पाण्डेय

जीता था खुदी के लिए यह नाचीज़, तेरे दीदार ने सीखा दिया आशिकी पर जान निसार करना ! इस बंदे को तो पूरी दुनिया मालूमात थी दगाबाज फ़रेबी, तुझी से सीखा है लोगों पर एतबार करना !! खौफ था इसे किसी से दो अल्फ़ाज़ भी कहने में, तूने सीखा दिया इसे मोहब्बत-ए-इज़हार करना !!! -सचिन
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अगर तुझसे दिल लगाने का कसूर न होता ! – सचिन अ॰ पाण्डेय

हम कब के तुम्हारे हो जाते सनम, अगर ज़िंदगी में कोई दस्तूर न होता !! दिल तक दस्तक जरूर दे पाते, अगर तेरे दिल का पता इतना दूर न होता !! कोई हमें बावला न कहता, अगर हम पर तेरे इश्क़ का सुरूर न होता !! हम इस मोहब्बत-ए-कैद से कब के रिहा हो जाते,
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मुझे सनम से प्यारा मेरा वतन कर दे ! – सचिन अ. पाण्डेय

ऐ मालिक,सिर्फ इतना-सा मुझपर तू करम कर दे ! मुझे सनम से प्यारा मेरा वतन कर दे, कर दूँ निछावर तन-मन-धन सब अपना; इतनी प्रज्वलित मुझमें राष्ट्रप्रेम की अगन कर दे । सकुचित न होऊँ क्षणभर भी सरफ़रोश बनने को, ऐसी मनोवृत्ति का मेरे ज़हन में जनम कर दे; अस्तित्व मिट जाए दहशतवादी नर-पिशाचों का
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