दिल को छू गई

दिल को छू गई

हवा की ये मतवाली चाल फूलोँ की झूमती डाल रंग-बिरगेँ किटोँ का जाल इसको कष्ट ना पहुँचाना रे मानव ! छु गई है दिलको मरे आया बसंत बनकर ये कैसा मेहमान खेलती है संग मेरे ये खेल ग्रीष्म मे जला दिया, शीत मे जमा दिया रुठ गए हमतो, बसंत मनाने चला आया उदासी भरे जीवन
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