जीवन की चमक उपन्यास-माला बिन्द

जीवन की चमक उपन्यास-माला बिन्द

गुनगुन का भाई भी दूर पढ़ने लगा था। एक बार उसके भाई की तबियत खराब होने के कारण घर आया था। जब जुगनू ठीक हो गया था। तब वह कालेज जाने की तैयारी में जुट गया था। जीनु और उसकी माँ आफिस गये थे। उसी दिन गुनगुन को एक बेबी पैदा होता है। तब गुनगुन अकेला पन महसुस कर के रोने लगी थी। वह बोली भाई भगवान ने हमें किस बात की सजा दी है। हम दोनों को अकेले ही रहना पड़ता है। वह अपने खून से एक कागज पर लिखती हैं कि भगवान ने हमें किस बात की सजा दी है, फिर उस कागज को अपने भाई से द्वार पर रखवा देती है। जब जीनु और उसकी माँ वापस घर लौटने के बाद वह कागज द्वार पर देखते ही उन दोनों का होश उड़ गए। वे लोग घर के बाहर ही रह गए और फिर अंदर नहीं आ रहे थे। तब गुनगुन ने एक काग़ज़ पर माचिस की तिली से जलाकर उस पर लिखती हैं कि आप लोग अंदर आ जाईये। फिर उस कागज को अपने भाई से जीनु के पास भेज दी। तब दोनों लोग अंदर आ गये और बेबी देखकर उन दोनों के खुशी का ठिकाना न रहा। वे लोग गाँव वालों के साथ मिलकर खुशियाँ मनाते हैं। सभी लोगों को मिठाइयाँ खिलाते हैं। जीनु उस बेबी का नाम ज़मी वन रख देता है। तब जुगनू भी कालेज चला गया। तीन साल के बाद जुगनू आई ए एस आफिसर बन कर घर लौटता है। कुछ दिन बाद जुगनू की भी शादी हो गई। उस लड़की का नाम रश्मि था, वह लोकोपायलट में काम करती थी। अब गुनगुन और जुगनू को झुग्गी की जगह स्वर्ग का घर मिल गया था। ज़मी वन की निमोनिया के कारण मौत हो गयी थी। गुनगुन को कई वर्षों तक कोई भी बच्चा नहीं होता है। जीनु की माँ उसे ताना मारती है। गुनगुन से यह व्यंग्य सहा नहीं जा सका। वह इस बात को लेकर काफी चिंतित हो जाती है। वह सोचती है कि अब मेरा मरना ही बेहतर है।
उसी समय रिमझिम भी बहुत दिनों के बाद जीनु को खोजते हुए उसके घर आती है। उस समय जीनु आफिस गया था। रिमझिम उसके आफिस पहुँच चली गई। जीनु बोला रिमझिम बहन अभी मैं कुछ खोज करने में लगा हूँ। तुम मेरे घर चली जाओ गुनगुन काफी समय से परेशान हैं। उससे बात कर लो। रिमझिम वापस जीनु के घर आती है। रिमझिम घर आने के बाद देखती है कि घर के सभी दरवाजे और खिड़कियाँ बंद थी। वह देखती है कि एक खिड़की खुली हुई थी। जब वह खिड़की से देखती है तो अंदर गुनगुन फांसी लगाने का प्रयास कर रही थी। तब रिमझिम जोर से चिल्लाती है कि गुनगुन रुक जाओ। गुनगुन एकाएक आवाज सुनकर रुक गई। फिर गुनगुन ने दरवाजा खोल दी और रिमझिम को अंदर ले कर आयी। गुनगुन ने फांसी लगाने की वजह रिमझिम को बताती है। रिमझिम गुनगुन को ऐसा काम करने से मना कर दी थी। फिर वह अपने घर जीनु से बिना मिले चली जाती है। दूसरे दिन रिमझिम हास्पिटल से एक बेबी को खरीदकर गुनगुन के पास जाती है। इस बेबी को गुनगुन के हवाले सौप देती है। गुनगुन बेबी को पाकर बहुत खुश हो जाती है लेकिन उसके मन में यह बात बस जाती है कि यह खरीदी गई लड़की है। वह उसका देख – भाल सही से नहीं करती थी। लेकिन जीनु उसे अपनी खून की बेटी समझता था। वह उसका नाम ज़मी टू रख दिया। ज़मी टू दो साल की उम्र हो गई थी। तब वह गुनगुन माँ की सभी हरकतों को समझने लगी थी। उसे गुनगुन का डाट – फटकार अच्छी नहीं लगती थी। अब वह अपने खून की माँ के तलाश में जुट गई थी। लेकिन बहुत दिनों के बाद ज़मी टू की उसकी असली माँ से मुलाकात होती है। एक दिन दरवाजे पर कोई महिला पुराने कपड़े मांगने के लिए आती है। ज़मी टू गुनगुन से नजरे बचाकर उस महिला के पास जाती है। तब वह महिला बोलती है कि बेटी मुझे क्षमा करना। मैं तुम्हें पैसे की कमी के कारण बेच दी थी। ज़मी टू उस महिला को पकड़कर रोने लगी थी। वह कहती हैं कि मांँ तुम्हारी तलाश में वर्षों गुजर गये। आज तुम मुझे मिल गयी हो। मैं तुम्हारे साथ चलुँगी। कुछ देर बाद गुनगुन द्वार पर यह माजरा देखने आ गयी और बोली ज़मी टू तुम्हें जाना है तो अभी इस घर से निकल जाओ। ज़मी टू अपना सामान लेकर अपनी असली माँ के साथ चली जाती है। शाम को जब जीनु घर आता है तो उसे ज़मी टू नहीं दिखाई देती है। वह गुनगुन से पुछता है कि ज़मी टू नहीं दिखाई दे रही है। तब गुनगुन कहती है कि वह अपने असली घर गयी है। वह अब इस घर नहीं आयेगी। जीनु ज़मी टू के याद में रात का खाना भी नहीं खाता है, लेकिन गुनगुन को कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। जब ज़मी टू अपने असली घर पहुँचती है तो वह वहाँ का पुरा माहौल अलग पाती है। वहाँ आलीशान मकान की जगह मिट्टी का छप्पर था। ज़मी टू के असली माँ का नाम जैनी था। जैनी ज़मी टू का नाम गाँव से बहुत दूर विद्यालय में दर्ज कराती है। जैनी मोची का काम करती थी। और दूसरों के कपड़ों से अपना काम चलाया करती थी। जैनी के पति की मौत रेलगाड़ी से कटकर हो गयी थी। ज़मी टू पढ़ने में ठीक थी। लेकिन उसकी कला की पेंटिंग बनाने में कलाकार थी। उसकी यह खुबी कोई नहीं जानता था। सभी बच्चे उसके नाम और ड्रेस का मजाक उड़ाया करते थे। लेकिन वह कुछ नहीं बोलती थी। ज़मी टू थोड़ी बहुत तुतलाती थी। इसके लिए भी बच्चे उसे चिढ़ाते थे। उसकी आवाज में उसके सामने बोलते थे। लेकिन वहकभी भी कुछ नहीं बोलती थी। एक दिन जब सभी बच्चों ने मिलकर बहुत देर तक चिढ़ा रहे थे। तब ज़मी टू बोली, बच्चों मेरे पास सैकड़ों की संख्या में नयी ड्रेस है। एक दिन तुम लोगों को दिखाएँग। तब सभी बच्चे ठहाका लगाकर हंसने लगे थे। लेकिन वह कुछ भी नहीं
बोली। जैनी एक पैर से थोड़ा विकलांग थी। जैनी के दूसरे पैर में चोट लग गयी थी। गाँव वाले बोले मोची मैडम अपने पैरों का इलाज करा लिजिये। वरना हम लोगों के जूतों की मरम्मत कौन करेगा। तब जैनी बोली पहले आप लोगों के जूतों की मरम्मत कर दूँ। बाद में इलाज करा लुंँगी। इसी तरह जैनी हमेशा गाँव वालों की बात टाल देती थी। उस समय ज़मी टू के विद्यालय में एक प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था। वह उस कला पेंटिंग में अपना पूरा कलाकारी दिखा देती है। सभी बच्चों की नज़र कक्षा की सबसे तेज छात्रा (मांसी ) पर रहती है। लेकिन ज़मी टू अपने गाँव वाली लड़की (प्रितु ) को बता देती है कि इस प्रतियोगिता में मेरा पहला स्थान प्राप्त होगा। मांसी यह बात किसी को नहीं बताती हैं। जब ज़मी टू घर आती है तो वह देखती है कि उसकी माँ हास्पिटल गयी थी। वह फौरन अपने मांँ के पास जाती है। उसकी माँ का पैर पुरा खराब हो गया था। डाक्टर ने बताया कि तुम्हारी माँ के आधे पैर काटने होंगे। तभी इसका इलाज संभव है। उसकी माँ के पैर के आधे हिस्से काट दिए गए थे। उसकी माँ ठीक तो हो जाती है लेकिन दोनों पैरों से विकलांग हो जाती है। उधर विद्यालय में ज़मी टू का सब लोग इंतजार कर रहे थे। जब कक्षा में प्रतियोगिता परिणाम सुनाया गया तो सभी बच्चों का होश उड़ गए। उस प्रतियोगिता में ज़मी टू प्रथम श्रेणी में थी और मांसी अंतिम श्रेणी में थी।
प्रितु दुसरी श्रेणी में थी। ज़मी टू सैकड़ों की संख्या में नयी ड्रेस बनायी थी। उनमें से दो पेंटिंग में मांसी और प्रितु की छिपी हुई तस्वीरें भी बनायी थी। अब जैनी भी कुछ काम नहीं कर सकती थी। गाँव वाले भी फटे जूते पहनकर घुमते थे। जैनी किसी के भी जूते की मरम्मत नहीं कर सकती थी। अब जैनी के पास खाने के लिए अन्न थोड़ा सा ही बचा था। ज़मी टू विद्यालय से नाम कटवा लेती है और अपने गुनगुन माँ के पास चली जाती है। अब गुनगुन भी ज़मी टू को अपनी बेटी और जैनी को बहन मानने लगती है। जैनी की पुरी तरह से गुनगुन देखभाल करती थी। अब ज़मी टू भी एक बडे कालेज में पढ़ने लगी थी। उसके पुराने विद्यालय के बच्चे उससे माफी मांगने के लिए उसके नये घर आते हैं। ज़मी टू उस समय कालेज में थी। कभी भी किसी बच्चे की मुलाकात नहीं हो सकती थी। ज़मी टू अपने पुराने विद्यालय के प्राचार्य को एक चिट्ठी लिखकर भेज दी। उस चिट्ठी में लिखी थी कि मांसी और प्रितु की छिपी हुई तस्वीर वाली पेंटिंग उन दोनों को दे दीजिए। और मैं इस विद्यालय में कभी नहीं आ सकती हूँ। सभी बच्चे ज़मी टू से माफी मांगने के लिए मन ही मन में सोचते थे। कभी किसी की मुलाकात ज़मी टू से नहीं हो सकती थी। बहुत वर्षों बाद ज़मी टू की मुलाकात एक पुलिस चौकी पर प्रितु से होती हैं। जब ज़मी टू उससे मांसी के बारे में पूछती है। तब वह बोलती है कि मांसी की शादी बारहवीं के बाद हो गयी थी। अब उसके पति की मौत हो गई है। उसके पास उसका एक पांच साल का बेटा रौनक है। ज़मी टू रौनक को पढ़ने के लिए पूरा पैसा खर्च करती थी। जब रौनक बडा होकर एक नौकरी करने लगता है। उसके बाद ज़मी टू अपनी शादी चालीस साल बाद करती है। अंत में सभी लोग एक परिवार बनकर रहने लगते हैं। सभी लोगों के जीवन में चमक छा जाती है।

संघर्ष, मेहनत, लगन और निष्ठा ही सफलता की जननी है।

 

   माला बिन्द

 

 

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