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अंदाज – ऐ गजल-राज-प्रजापति

मोहब्बत हो गयी तुमसे,
इनायत हो गयी रब की।
न कितने लम्हों से हम यूँ ,
खामोश बैठें हैं ।
कभी देखी थी सपने में ,
तुम्हारी इक झलक हमनें।
तभी तो आज तक हम भी ,
यूँ मदहोश बैठे हैं । मोहब्बत – – – –
कभी पूँछो जरा अपनी ,
मोहब्बत के दीवानों से।
वो क्या बतलायगें जो खुद ही ,
बेहोश बैठे हैं । मोहब्बत – – – – –

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