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ग़ज़ल-ए-गुमनाम-डॉ.सचितानंद-चौधरी

ग़ज़ल-32

जब भी मिले तुम्हें दर्द में डूबा हुआ पैगाम मेरा
मुस्कुराकर छू लेना लबों से एक बार नाम मेरा

छोड़कर बस्ती खुशबुओं की पास ना आना मेरे
कहा आँसूओं ने “ये है तुझे आख़िरी सलाम मेरा”

लाख पाना चाहा मैं तुम्हें ख़ुद तक को बेचकर
पर बेदर्द वक़्त के बाज़ार में कुछ नहीं दाम मेरा

अगर कोई पूछे तुमसे रिश्ता दर्द और प्यार का
मुस्कुराकर बता देना उसे भी इक बार नाम मेरा

कभी सितारों ने भी हँसा मुझपर भरी महफ़िल में
तभी तो “शशि” के नाम से नाम हुआ बदनाम मेरा

लेखक-डाॅ सच्चितानन्द चौधरी “शशि”
दिनांक- 15-05-1993

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