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ग़ज़ल – ए – गुमनाम-डॉ.सच्चितानंद चौधरी

                  ग़ज़ल-16

पिट कर वक़्त-ए- शतरंज़ में हम बेकार हो गए हैं
कल तक तो अज़ीज़ थे आज़ गुनहगार हो गए हैं

ऐ ज़िन्दगी किस दुकाने-गम़ से कफ़न खरीद लाऊँ
अब तो हम अपनी मौत के भी कज़र्दार हो गए हैं

बादौलत की दौर में तो हुआ करते थे दोस्त हज़ार
दौर-ए- बेदौलत में अब मेरे दुश्मन हज़ार हो गए हैं

मुफ़लिसी में रहती थी जिनमें देर तक मेरी ख़ुशबू
अमीरी तन में उनके बदन अब ख़ुशबूदार हो गए हैं

ज़मीन पर कदम अब आप ज़रा आहिस्ते रखियेगा
अब घुँघरु आप के पायल के भी पहरेदार हो गए हैं

कल तलक जो खेले मेरी चाँदनी से ‘शशि’ कहकर
आज़ गर्दिशों में हम उन्हें ही क्यों दाग़दार हो गए हैं

      लेखक- डाॅ सच्चितानन्द चौधरी "शशि" 
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Dr.sachitanand-Chaudhary

Dr.sachitanand-Chaudhary

Medical Practioner .Writing poetries and gazals from class ninth.

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