Notification

अपने लेख प्रकाशित करने के लिए यहाँ क्लिक करें!

गज़ल-नरेंद्र नायक

तेरी ही मोहब्बत में सनम, मैं तारे गिनता रहता हूँ!
मोहब्बत का यह सिला-मिला, अब उनसे ही शिकायत करता हूं!!

सनम क्या ख़्वाब देखे थे, और क्या पुरे कर रहा हूँ!
सोचा था दुनियाँ हसीं होगी, अब उनसे ही नफ़रत कर रहा हूँ!!

हम किस राह में थे चल पड़े, अब मंज़िल को तरस रहा हूँ!
तुम मिले ना कही हमें, अब दर-ब-दर ढूंढ रहा हूँ!!

बौ कर पौधा झाड़ का, तमन्ना गुलाब की कर रहा हूँ!
खुश्बू कहां से देगा वो, कांटो से आशा कर रहा हूँ!!

निकल पड़ा हूं अँधेरों में, जाने कहां जा रहा हूँ!
पता नही है चराग़ो का, कद़मो के निशां भी मिटा रहा हूँ!!

तस्वीर तेरी लेके मैं, हवा से बाते कर रहा हूँ!
मोषम के इरादे नेक नही है, तुफां से मशक्कत कर रहा हूँ!!

सिने में लेकर याद तेरी, किस्मत से झगड़ा कर रहा हूँ!
तूं मिले कहीं तो कहूं तुम्हे, किस दौर से गुजर रहा हूँ!!

सुखे हुए है लब मेरे, मरूधर में सागर खोज़ रहा हूँ!
तुम बुझा दो आके प्यास मेरी, दीदार को मैं तड़प रहा हूँ!!

तेरी ही मोहब्बत का मारा मैं, अब मज़नू सा हो रहा हूँ!
जो दिये हुए है जख़्म तेरे, उन्हे कुरेद कर अब हस रहा हूँ!!

163 views

Share on

Share on whatsapp
WhatsApp
Share on facebook
Facebook
Share on twitter
Twitter
Share on linkedin
LinkedIn
Share on email
Email
Share on print
Print
Share on skype
Skype

Leave a Reply

पर्यावरण-पुनः प्रयास करें

पर्यावरण पर्यावरण हम सबको दो आवरण हम सब संकट में हैं हम सबकी जान बचाओ अच्छी दो वातावरण पर्यावरण पर्यावरण हे मानव हे मानव पर्यावरण

Read More »

Join Us on WhatsApp