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आरसेप संगठन में भारत-वीरेंद्र देवांगना

आरसेप संगठन में भारत::
आरसेप का आशयः आरसेप (रिजनल कंप्रेहेंसिव इकोनोमिक पार्टनरशिप), आसियान के 10 सदस्य देशों और छह अतिरिक्त देशों (भारत, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, आस्टेªलिया व न्यूजीलैंड) का एक मुक्त व्यापार समझौता है।
आरसेप में शामिल देशः चीन, आस्टेªलिया, जापान, दक्षिण कोरिया, न्यूजीलैंड, (वियतनाम, थाइलैंड, इंडोनेशिया, फिलीपींस, ब्रुनेई, लाओस, मलेशिया, म्यांमार, सिंगापुर व कंबोडिया)-ये दस आसियान के सदस्य देश हैं।
आरसेप की बैठकः थाइलैंड की राजधानी बैंकाक में 4 नवंबर 2019 को प्रधानमंत्री पीएम नरेंद्र मोदी ने दो टूक कहा कि मौजूदा वैश्विक हालात व समझौते के प्रारूप में उसके हितों व मुद्दों को पूरा स्थान नहीं दिए जाने की वहज से भारत इसमें सम्मिलित नहीं होगा। इसके लिए ना तो गांधीजी का सिद्धांत और ना ही उनका जमीर इस समझौते में शामिल होने की इजाजत दे रहा है।
अब, भारत के बगैर एशिया-प्रशांत क्षेत्र के 15 बड़े देश आरसेप यानी रिजनल कंप्रेहेंसिव इकोनोमिक पार्टनरशिप-आरसेप नाम से गठित मुक्त व्यापार समझौते को आगे बढ़ाने का फैसला किया गया है।
भारत को जापान का मिला साथः आरसेप के मुद्दे पर भारत को जापान का साथ मिला है। जापान ने साफतौर पर कहा है कि वह भारत की भागीदारी के बगैर आरसेप में शामिल नहीं होगा। इसके लिए भारत और जापान ने पाकिस्तान से संचालित आतंकी नेटवर्क को क्षेत्रीय शांति के खतरा बताते हुए उसे खत्म करने की दिशा में ठोस कदम उठाने की मांग की है। आतंकवाद से निपटने में पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं का पालन करना चाहिए। इसके साथ ही उसे वित्तीय कार्रवाई बल (एफएटीएफ) द्वारा सुझाए गए उपाय भी करने चाहिए।
इसका अर्थ यह कि एशिया की दो बड़ी आर्थिकशक्ति अगर आरसेप से बाहर रहती हैं, तो कवायद व्यर्थ हो जाएगी। जापान ने भारत का साथ देकर एक तो दोस्ती निभाया है, दूसरा भारतीय चिंताओं के निराकरण पर दबाव बनाया है। अर्थ के मोर्चे पर भारत-जापान के व्यापारिक हित हैं। इससे यही संदेश जाता है कि जापान भारत का आगे भी पक्का सहयोगी बना रहेगा। यह भारत की कूटनीति की जबरदस्त जीत है। अब दुनिया को भारतीय हितों की अनदेखी करने के पूर्व सोचना पड़ेगा।
असरः भारत का यह फैसला आरसेप के देशों के लिए करारा झटका है। कारण कि चीन, आस्टेªलिया, न्यूजीलैंड की नजर भारत के विशाल घरेलू बाजार पर थी। आशियान देशों की 90 फीसदी वस्तुएं और चीन, न्यूजीलैंड व आस्टेªलिया की तकरीबन 74 फीसदी वस्तुएं शुल्कमुक्त हो सकती थीं। आसियान के दस सदस्य देश पिछले कुछ सालों में भारत के प्रति ज्यादा उदारता दिखा रहे थे, तो इसके पीछे आरसेप ही था। आरसेप के सदस्य देश वैश्विक उद्योग में एक श्रंृखला स्थपित करने की मंशा रखते हैं। सवाल यही कि क्या भारत बड़े औद्योगिक श्रृंखला का हिस्सा बनने से रह गया है? जबकि उसकी लुक ईस्ट नीति अहम मुकाम पर पहुंच रही है।
किसान संगठनों में गुस्साः आशंका है कि इससे घरेलू किसानों की कमर टूट जाएगी। करीब 10 करोड़ छोटे व भूमिहीन किसानों के समक्ष रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो जाएगा। आस्टेªलिया व न्यूजीलैंड जैसे डेयरी उत्पादक देशों से घरेलू बाजार में डेयरी उत्पादों की बाढ़ आ जाएगी। भारत के छोटे किसान अपनी रोजी-रोटी के लिए पशुपालन व दुग्ध उत्पादन से जुडे़ हुए हैं, उनको काफी नुकसान उठाना पडे़गा। भारतीय किसान को पहले से उनकी उपज का वाजिब दाम नहीं मिल रहा है। अब, बाहरी उत्पादों के आवक से उनकी हालत पतली हो जाएगी। भारत के तमाम किसान संगठन जैसे-स्वदेशी जागरण मंच, अखिल भारतीय किसान महासभा, किसान शेतकारी संगठन, अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति आदि ने इस पर कड़ा ऐतराज जताया है।
उद्यमियों की आशंकाः औद्यागिक संगठनों को आशंका है कि जो उत्पाद हमारे देश में निर्मित हो रहे हैं, वे दूसरे देशों के पास जरूरत से ज्यादा होने के कारण भारत के मुकाबले सस्ता है, तो इनको भारत में खपाने से भारतीय व्यापार व उद्योग-धंधे चैपट हो जाएंगे। भारतीय उद्यमियों का माल कोई नहीं खरीदेगा। लेकिन, जो उत्पाद भारत में निर्मित नहीं होते, उसको यदि यहां लाकर खपाए जाएं, तो किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती। इसके लिए सरकार को व्यापक नीति बनानी चाहिए। फिर सोच-समझ कर फैसला लेना चाहिए। वैसे भी भारत में बेरोजगारी और मंदी की दर कहीं ज्यादा है, जो समूचे अर्थतंत्र को तबाह कर सकता है।
उपसंहारः इसके सदस्य बनने जा रहे 15$1 देशों की आबादी दुनिया की सकल जनसंख्या का 50 प्रतिशत है। आबादी देखकर भारत के जुड़ने के अपने तर्क हैं, लेकिन बाकी देशों का सारा माल भारत जैसे बड़े बाजार में खपाए जाने का खतरा भी बड़ा है। आयात शुल्क अब तक घरेलू उत्पादकों को सुरक्षा देते रहे हैं। समझौते के बाद करीब 90 फीसदी उत्पादों पर आयात शुल्क या तो हटा दिया जाएगा या बेहद कम हो जाएगा। ऐसी स्थिति में भारतीय उत्पाद चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, आस्टेªलिया, न्यूजीलैंड जैसे देशों के सस्ते माल के चक्रव्यूह में फंसकर अपना भट्टा बैठा लेगा।
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