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अहितकारी बैंकिंग व्यवस्था-वीरेंद्र देवांगना

अहितकारी बैंकिंग व्यवस्था::
देशहित व जनहित में नियमों को शख्त करने की जरूरत है, ताकि जनधन के लुटेरों एवं उसके आकाओं के गिरेबान में हाथ डालकर पैसा निकाला जा सके।
यह कैसा बैंकिंगतंत्र है कि एक ओर तो ललित मोदी, विजय माल्या, नीरव मोदी, मेहुल चैकसी, विक्रम कोठारी और भांति-भांति के लुटेरे बैंको का धन लूट कर ले जाते हैं और सरकारें व बैंके सांप निकल जाने के बाद लकीर पीटती रहती हैं, तो दूसरी ओर जरूरतमंदों के खूनपसीने की कमाई पर गिद्धदृष्टि डालती रहती है।
सरकार ने भगोड़ा आर्थिक आपराधिक कानून को स्वीकृति दिया है। यद्यपि यह अधिनियम भगोडों की संपत्ति कुर्क करने और उसे बैंकों में जमा करने का अधिकार देता है, तथापि आर्थिक अपराध को समूल नष्ट करने के लिए यह अधिनियम नाकाफी है। ऋण स्वीकृति के लिए गठित तीन सदस्यीय बोर्ड महज छलावा और बेईमानों का रक्षाकवच है। क्योंकि ये जिनकी सिफारिशों से बोर्ड के सदस्य बनते हैं, उनकी ही तो जी हजूरी करेंगें।
इसमें इस बात का प्रावधान किया जाना चाहिए कि ऋण स्वीकृतकर्ता अधिकारी को ऋण वसूली के लिए पूरी तरह जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। वसूली न कर पाये, तो पहले उसके वेतन से वसूल किया जाना चाहिए, फिर भी वसूली न हो, तो जेल भेजना चाहिए।
इस एक नियम को कठोरता से लागू करने से खाते एनपीए कभी नहीं होगें। कोई विदेश नहीं भागेगा? जो शख्स ऋण मंजूर करता है, वही ऋण न चुकाने के रास्ते सुझाता है। इस कड़क नियम से निश्चित है कि सारे गोरखधंधे बंद हो जाएंगे।
ऋण मंजूरी के दौरान सिफारिशी फोन करनेवाले और आदेश फर्मानेवाले ओहदेदारों, रुतबेदारों व रसूखदारों के नाम व फोन नंबर उस फाईल में कोड होना चाहिए। जब उधारकर्ता लोन का चुकारा करने में हीलाहवाला करे, तो इन पदधारियों को जवाबदेह मानते हुए इनके घरांे में भी वसूली का नोटिस थमाया जाना चाहिए। फिर देखो इस खेल का मजा! सारी धांधलियां व बदमाशियां स्वतः थम जाएंगी। जब बागड़ बिल्लों पर लगाम लगेगा, तभी बागड़ महफूज रहेगा।
देश की विडंबना है कि कोई राष्ट्रविरोधी नारे लगाता है या देशद्रोह के कार्य में निमग्न रहता है, तो उसे राष्ट्रद्रोह माना जाता है। माना भी जाना चाहिए। लेकिन, अब आर्थिक अपराधियों को भी राष्ट्रद्रोही माना जाकर उनपर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलाया जाना चाहिए।
इनके सहयोगियो एवं नातेदारों की संलिप्तता उजागर होने पर उन्हें भी कड़ी-से-कड़ी सजा दिया जाना चाहिए। कारण, सूचना छिपाना भी अपराध की श्रेणी में गिना जाता है।
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Virender Dewangana

Virender Dewangana

मैं शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त हूँ। लेखन में रुचि के कारण मै सेवानिवृत्ति के उपरांत लेखकीय-कर्म में संलग्न हूँ। मेरी दर्जन भर से अधिक किताबें अमेजन किंडल मेंं प्रकाशित हो चुकी है। इसके अलावा समाचार पत्र-पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं निरंतर प्रकाशित होती रहती है। मेरी अनेक किताबें अन्य प्रकाशन संस्थाओं में प्रकाशनार्थ विचाराधीन है। इनके अतिरिक्त मैं प्रतियोगिता परीक्षा-संबंधी लेखन भी करता हूँ।

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