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अहंकार-अजय मिश्रा

भाईयों आप सभी अहंकार शब्द से तो परिचित ही होंगे ।शायद ही कोई
मनुष्य इससे अछूता रहा हो।जाने अनजाने सभी लोग ही इससे कम या
अधिक मात्रा में प्रभावित हुए ही होंगे।अहंकार से ग्रसित व्यक्ति की
आँखों मे परदा पड़ जाता है ।वह अच्छे और बुरे में फर्क महसूस नहीं कर
पाता है।अब बात यह उठती है की अहंकार है क्या?अहंकार झूठी
प्रसिद्धि प्राप्त करने की उच्चतम आकांक्षा है ।झूठी शान में जीते हुए
अंदर से उमड़ने वाले तैश का नाम ही अहंकार है।अहंकार मानव
स्वभावगत ऐसी बुराई है जिसने आज सम्पूर्ण मानव जाति को अपने
आगोश में ले रखा है।अहंकारी व्यक्ति किसी अन्य को अपने से श्रेष्ठ नहीं
मानता है।अहंकारी व्यक्ति जब इस मार्ग पर निकल पड़ता है तो अपने
सर्वनाश के पहले रुकने का नाम नहीं लेता है।वर्तमान समय में देश के
अंदर कई राजनेताओं को अहंकार ने अपनी मुट्ठी में फँसा रखा है।उन्हें
इसका तनिक भी भान नहीं है की इसकी अन्तिम परिणति क्या होगी?
शायद!या निश्चय ही उनकी इति।उनकी भी वही दशा होगी जो की
लंकापति रावण की हुई थी।रावण भी अहंकार से ग्रसित होकर माता
सीता को छलपूर्वक हरण कर लंका ले गया था।और माता सीता के
समक्ष झूठी शान का स्वयं बखान कर अपनी शरण मे आने के लिये
विवश किया था।तब माता सीता ने कहा- “आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान।
परुष वचन सुनि काढ़ि अस बोला अति खिसिआन”।।
माता सीता के इन वचनों को सुनकर वह अत्यधिक क्रुद्ध हुआ।अहंकार
के वशीभूत रावण की सत्य और असत्य के मार्ग को पहचानने की शक्ति
क्षीण हो चुकी थी।वही दशा वर्तमान मे कुछ अहंकारी मनुष्यों की भी है।
जो की उस जुगनू की भाँति हैं जो की थोड़ी सी शक्ति और प्रकाश को
प्राप्तकर अपने को सूर्य की भाँति शक्तिशाली और प्रकाशवान समझने
की गलती कर बैठते है।अहंकारी मनुष्य उस जुगनू के समान है ।जो स्वयं
के प्रकाश से पूर्णरूपेण अपने को भी प्रकाशित नहीं कर सकता है।
लेकिन उसे यही लगता है की मेरे ही प्रकाश से सारा संसार प्रकाशित हो
रहा है।किन्तु अहंकार से रहित व्यक्ति उस सूर्य की भाँति है जो स्वयं के
आभामंडल से तेजवान रहते हुए सम्पूर्ण जगत् को आलोकित करता है।
अब यह वर्तमान मानव जाति के बुद्धि और विवेक पर निर्भर है की वह
किस मार्ग को अपनाना चाहता है ।चाहे तो अहंकार से युक्त होकर रावण
बने या अहंकार से रहित होकर मर्यादा पुरषोत्तम भगवान श्रीराम के
आदर्शों पर चले।और अन्त मे मैं ईश्वर से यही कामना करता हूँ की हे प्रभु
सम्पूर्ण मानव जाति को अहंकार रहित करके बल,बुद्धि,विद्या प्रदान
करें जिससे हमारे भारत देश का कल्याण सम्भव हो सके।
बुद्धिहीन तनु जानिके सुमिरौ पवनकुमार।
बल बुद्धि विद्या देहूँ मोहि हरहुँ कलेश विकार।।
जय श्री राम ।
अजय मिश्र
रीवा(मध्यप्रदेश)

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Ajay-mishra

Ajay-mishra

मैं म.प्र. के रीवा शहर का निवासी हूँ।मैं म.प्र.शासन अन्तर्गत स्कूल शिक्षा विभाग में उच्च माध्यमिक शिक्षक (इतिहास) पद पर कार्यरत हूँ । शैक्षणिक योग्यता-M.A.(history &hindi),LL.B., b.ed., M.Phil., UGC NET(HISTORY AND HINDI) वर्तमान में विभागीय M.Ed. में अध्ययनरत हूँ। मुझे कविता,कहानियाँ और आलेख पढ़ने का शौक है ।कभी कभार समय मिलने पर लिखने का भी प्रयास करता हूँ ।

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