अंतर्मन स्त्री का- हेमा पांडे

अंतर्मन स्त्री का- हेमा पांडे

आज मैं उम्र के उस पड़ाव पर पहुंच चुकी हूं जहां पर एक औरत का अपने मन का कुछ भी कर पाना बेशर्मी होगी ,बेहयाई होगी. पर क्या मेरा कुछ एहसास बाकी नहीं है क्या मुझे अपनी खुशियों के लिए जीने का अधिकार नहीं है क्या मैं जी सकती हूं लेकिन उन्हीं बंधनों में बंद कर जिसे समाज ने मेरे लिए चुना है तय किया है .आज मैं घुटी घुटी जिंदगी जी रही हूं तो क्या यह मेरा भाग्य है क्या मैं अपने भाग्य को बदल नहीं सकती या बदलने की कोशिश नहीं कर सकती कोशिश करूंगी तो समाज मुझे निर्लज्ज कहेगा. मैं क्या करूं .मैं क्या करूं .मैं क्या करूं. अपने आप से पूछती हूं क्या इन्हीं चारदीवारी में रहना मेरी नियति है क्या यही जन्मसिद्ध अधिकार मिला है मुझे. मैं किसी को चाहूं तो यह मेरी बेशर्मी होगी और इज्जत के ऊपर कलंक होगा तो क्या करूं मैं .मेरी पूरी जिंदगी बीत गई सिर्फ कभी मां-बाप की इज्जत के बारे में सोचा तो कभी पति के सम्मान के बारे में फिर बच्चों के बारे में .मैं अपने लिए कब जिउ,मैं अपने लिए कब जिउ ,आज शब्दों की परिभाषा बदल चुकी है पर मेरे लिए वही है बेटी एक पत्नी एक मां क्या इन्हीं तीनों रिश्तो में बद कर मैं अपनी पूरी जिंदगी गवा दूं, आधी तो बीती चुकी है ,आधी भी गवा दूं. कैसे निकले इन रिश्तो को साथ लेते हुए अपने स्वतंत्रता की लड़ाई के लिए कैसे बाहर निकले. किस से लड़ूं. कौन है मेरा. जो मेरे लिए लड़ेगा मुझे इंसाफ दिलाएगा एक औरत होने का या फिर एक औरत के स्वतंत्रता का की स्वतंत्रता का इंसाफ.. मैं औरत हूं यह मेरा भाग्य है या नहीं भाग्य समझ नहीं आता तभी तो औरत होने का जो कलंक माथे पर है सदा साथ चलता है. अकेले घर से बाहर निकलो मत .अंधेरे में कहीं जाओ मत ,घर की चारदीवारी में रहो वरना यह हो जाएगा वह हो जाएगा .क्या मेरे अंदर कोई जज्बात नहीं है कोई आकांक्षा नहीं है क्या मैं अपने मन का कुछ नहीं कर सकती .हमेशा दूसरों के आदेश पर ही चलूं. कभी पिता आदेश देता है बेटी यह मत करो वह मत करो मेरे सम्मान को ठेस लगेगा इज्जत जाएगी. शादी के बाद पति कहता है ऐसे रहो वैसे रहो . नहीं तो लोग क्या कहेंगे .है फला की बीवी ऐसी है फिर बेटा बेटी कहेंगे मां ऐसे करो मां वैसे करो हर कोई नसीहत ही देगा मैं हूं क्या .क्या मैं एक ऐसी गुड़िया हूं जिसमे चाबी भर दी गई चलेगी तो चाबी भरने वाली की मर्जी से ही. क्या मैं कुछ नहीं कर सकती अपनी मर्जी से क्या मरतेदमतक मुझे दूसरों की ही आदेश की पालन करना होगा क्या मुझे औरत होने का उम्र भर ही सजा भुगतनी होगी मैं औरत हूं तो. तो क्या हुआ क्या मैं अपने लिए जी नहीं सकती क्या मैं खुलकर हंस नहीं सकती क्या मैं कहीं आ जा नहीं सकती हर समय रोक 2 एक औरत पर ही क्यों. क्यों .कौन मेरे सवालों का जवाब देगा कौन मेरे अंतर्मन में उठे इस विचारों को बांधेगा या फिर बाहर निकालेगा मैं अपने अंतर्मन की सिद्धांत से कब तक जूझती जागती रहूंगी. कब तक लड़ती रहूंगी. मुझे स्वतंत्रता चाहिए मुझे आजादी चाहिए मुझे एक खुली जिंदगी चाहिए जिसमें मैं सांस ले सकूं खुलकर कर जी सकूं कौन देगा मुझे ऐसी जिंदगी कौन देगा .कौन देगा

 

हेमा पांडे

 

 

 

 

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