अप्सरा-हेमा पांडे

अप्सरा-हेमा पांडे

अप्सरा शब्द सुनते ही हम कल्पनाओं के लोक में विचरण करने लगते हैं. हमारे मानस पटल विभिन्न प्रकार के विचार उमड़ने – घुमडने लगते हैं जो हमें यह सोचने पर विवश कर देते हैं की कैसा होता होगा वह अप्रतिम सौंदर्य ,, शायद ऐसा की जिसे देख कर व्यक्ति ठगा सा रह जाए अदभुत व आश्चर्यजनक सौंदर्य या फिर ऐसा जिसे देख कर दिल धड़कना बंद कर दे और सीने में सांसे अटकी रह जाए ऐसा अनूठा सौंदर्य तो फिर क्यों ना हो किसी भी मन मे ऐसे अद्वितीय सौंदर्य को देख लेने की इच्छा फिर क्यों ना हो उसे पा लेने तथा अपने में समेट लेने की इच्छा हम कल्पना करने लगते हैं. उस अद्वितीय सुंदर की उस सौंदर्य की जिसे देखने के लिए हमारी आंखे हर पल हर क्षण लालायित रहती है जिस विचित्र और अचरज भरे सौंदर्य का साक्षात्कार हमारे देवताओं ने भी किया है जिन्होंने उस नारी सौंदर्य को अपनी कल्पना शक्ति और उनके अंतर्मन से प्रस्फुटित आनंद सौंदर्य के उद्वेग से आपूरित होकर अपने मन की अभिव्यक्ति को अलग अलग ढंग से प्रस्तुत किया है. जिसके आधार पर साधारण मानव केवल कल्पना कर सकता है ऐसा होता होगा वह सौंदर्य जिसे देख हमारे पूर्वज ऋषि देवता और भी मंत्रमुग्ध हो गए. कैसे कौन होगा वह शिल्पकार और कैसे वह संयत्र रह गया होगा इतनी मादकता को एक ही देह में भरते हुए’ इतनी मादकता को एक ही देह में भरते हुए. उसमें प्राण डालते हुए ऐसा सौंदर्य तो केवल कवियों की पंक्तियों में या फिर शिल्पकारों के हाथों में छिपे जादू से ही गड़ा जा सकता है. और ऐसे ही रूप के भार से लदा सुंदर है उस अप्सरा का जिसके एक-एक अंग प्रत्यंग को इसी प्रकार गढ़ा गया है जो ऐसे ही रूप सौंदर्य का खजाना है जिसकी तुलना अन्य अप्सराओं से भी नहीं की जा सकती जो अप्सराएं पूर्ण रूप से सौंदर्य का आधार मानी गई है. बिना सौंदर्य के तो नारी शरीर की कल्पना ही नहीं की जा सकती या यूं कहें तो नारी शरीर के बिना सौंदर्य कहीं खिल ही नहीं सकता .यह तो प्रकृति सौंदर्य पुरुष सौंदर्य भी होते हैं लेकिन सौंदर्य जहां खिल उठता है वह नारी ही होती है .और उसी में समाई होती है अप्सरा..

 

 

   

 हेमा पांडे

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