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बैंकों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव, भाग-2-वीरेंद्र देवांगना

बैंकों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव, भाग-2
6. क्या आलाबैंक प्रबंधन शहरों, नगरों व गांवों में अपने कर्मचारियो-अधिकारियों के रहने लायक क्वार्टर का निर्माण बैंक परिसर में नहीं कर सकता? जिससे बैंक कर्मचारियों को रहने की समस्या से मुक्ति मिले। समस्या तो यही कि यह रियल इस्टेट के डूबत खाताधारकों को बैंक लोन फिर-फिर दे सकता है, किंतु अपने कर्मचारियों-अधिकारियों को एक सुविधायुक्त आवास बनाने में आनाकानी करने लगता है।
7. कर्मचारियों का वेतन हर पांचवे वर्ष रिवाइज होना चाहिए। लेकिन बैंक प्रबंधन की लापरवाही के कारण अब तक उन्हें पुराने वेतन के अनुसार ही भुगतान किया जा रहा है। जो ऊंट के मुॅंह में जीरा के समान है और कर्मचारियांे का अहित करनेवाला व उनको आर्थिक क्षति पहुंचानेवाला है।
8. महिला कर्मचारी को भी जानबूझकर उसके निवासस्थान से 200 से 500 किमी दूर स्थानांतरण कर दिया जाता है। जबकि केंद्र सरकार के स्थानांतरण नीति में स्पष्ट है कि महिला कर्मचारी को उसको पिता या पति के निवास से निकटस्थ ही पदस्थ किया जाना चाहिए। जो बैंकें केंद्रीय सरकार के स्वामित्व में हैं, उनमें यह नियम क्यों लागू नहीं किया जा रहा है?
9. केंद्रीय सरकार के महिला कर्मचारियों के लिए 6 माह का प्रसूति अवकाश और एक साल का विशेष अवकाश देने का प्रावधान है, जिसे वे अपने सेवाकाल में किसी समय भी उपभोग कर सकती हैं। बैंकों में प्रसूति अवकाश वाला नियम तो लागू है, कितु एक साल वाला नहीं है। क्या यह दोहरापन नहीं है?
10. बैंकों में एक अदद फील्ड आफीसर या वसूली अधिकारी नहीं रहता, जो ऋणों की स्वीकृतियां देता है और वसूलियां करता है। लिहाजा, ये जिम्मेदारी भी बैंक मैनेजर को निभानी पड़ती है। अब, वह बैक का सामान्य कामकाज देखे कि ऋणों के लिए कार्रवाहियां करे कि घर-घर वसूली करता फिरे कि वसूली कैंप लगाए कि डिफाल्टरों को नोटिश जारी करे कि वसूली अधिकारी तहसीलदार से समन्वय स्थापित करे कि सरकारी वित्त पोषण संबंधी कलेक्टर या लीड बैंक मैंनेजर की बैंठकों में हाजिर हो। इसलिए ज्यादातर ऋण डूबत खाते में चले जाते हैं और बैंक सांप निकल जाने के बाद लकीर पीटता रहता है।
11. अभी 21 राष्ट्रीयकृत बैकों में 10 लाख कर्मचारी-अधिकारी हैं और लगभग 5 लाख कर्मचारियों-अधिकारियों के पदरिक्त हैं। इधर बेरोजगारी का आलम यह कि युवा पीढ़ी हताश होकर अपराध की ओर बढ़ रही है, उधर कर्मचारियों का भर्ती नहीं किया जाना उच्च प्रबंधन की बदमाशी है। ये लोग एकओर तो विजय माल्या, नीरव मोदी, मेहुल चैकसी, विक्रम कोठारी और तमाम धनकुबेरों से रिश्वत लेकर एक ऋण के रहते दूसरे अरबों-खरबों की ऋण स्वीकृतियां देते हैं, तो दूसरीओर नए कर्मचारियों की भर्ती नहीं कर पुराने कर्मचारियों को काम से लाद देते हैं। यह सीधा-सीधा उच्च प्रबंधन की कूट व कपटनीति है।
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