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बैंकों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव, भाग-1-वीरेंद्र देवांगना

बैंकों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव, भाग-1
भला हो देश के दूसरे सबसे बड़े बैंक-पीएनबी महाघोटाले का, जिसने बैकिंग-प्रणाली, उसके लेनदेन की पद्धति, प्रबंधन-कर्मचारी-अधिकारी संबंध और उसमें व्याप्त अव्यवस्था को सार्वजनिक कर दिया; वरना इसके पूर्व बैंकों के प्रति आम धारणा यही थी कि बैंके साधनसंपन्न व सुविधासंपन्न हैं। उसका प्रबंधन और बैंक भवन दुरुस्त है। उसके छोटे-बड़े कर्मचारियों व अधिकारियों को वह तमाम सुविधाएं; बल्कि अधिक सहूलियतें प्राप्त हैं, जो आम कार्यालयों के कर्मचारियों को हासिल हैं।
इसे ही कहते हैं-नाम बड़े और दर्शन थोड़े। बाहर सब-कुछ अच्छा-अच्छा और अंदर काफी-कुछ कचरा और बुरा-बुरा। जो इस प्रकार हैंः-
1. बैंक कर्मचारी-अधिकारी को अक्सर आपने सुबह 10 बजे से रात 9-10 बजे तक काम करते देखा होगा। ऊपर से छुट्टी के दिनों में भी गेट बंदकर काम में खटते देखा होगा। इसका कारण यह कि बैंक में कर्मचारी हैं कम; और काम अधिक।
2. तमाम योजनाएं बैंकों से संचालित हैं। यथा- अन्य कार्यालयों के कर्मचारियों का वेतन एवं अन्य भुगतान, सेवानिवृत्ति एवं निराश्रित पेंशन का भुगतान, खाते से आघार नंबर को लिंक करना, जनधन योजना का संधारण, जीवन ज्योति योजना, जीवन सुरक्षा योजना व अटल पेंशन योजना का संधारण, मुद्रा योजना, आवास योजनाएॅं, मनरेगा एवं अन्य हितग्राहीमूलक योजनाओं का खाता संधारण और उनका भुगतान करना।
3. देश-प्रदेश में जो नई योजना लांच की जाती है, उसका संबंध बैंक से रहता है। कर्मचारी की कमी से जूझ रहे बैंक-मैनेजर के लिए एक नई मुसीबत आ जाती है कि इस नई योजना को किस कर्मचारी के मत्थे मढ़ा जाए? क्योंकि उसे मालूम है कि वह जिस किसी को भी सौंपेगा, वह सीधी मुंह बात नहीं करेगा। इसका कारण यह कि वह पहले भी उन्हीं कर्मचारियों को बहला-फुसला कर नई-नई योजनाएं थौंप चुका है। वह देख रहा है कि कर्मचारीगण काम के बोझ तले दबे हुए हैं और कुनमुनाते हुए काम को अंजाम दे रहे हैं।
4. कहा जाता है कि बैंको के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बीमा योजनाएं हैं, जो लक्ष्य लेकर आता है और बैंक प्रबंधक को बेजा परेशान करता है। इसके लिए ऊपर का प्रबंधन लक्ष्य निर्धारित करता है और बैंक को सौंप देता है। अब, बैंक मैनेजर किसी कर्मचारी से ये काम करवाता है और लक्ष्य हासिल करने का प्रयास करता है। इसमें यही कि जब लक्ष्य हासिल नहीं होता, तो बैंक मैनेजर सहित संबंधित कर्मचारी को अपने वेतन से फर्जी बीमा भरकर देना होता है, वरना ऊपरी प्रबंधन से तबादला और निलंबन की धमकियां दी जाती हैं। वस्तुतः यह आलाप्रबंधन के कमीशन का खेल रहता है, जो उसको बीमा कंपनियों से मिलता है। इसलिए वे नीचेवाले को बलि का बकरा बनाकर अपना उल्लू साधते रहते हैं।
5. एकओर बैंकें लाखों-करोड़ों रुपया उधारी बांटती रहती हैं और खातों को जाने-अनजाने एनपीए करवाती रहती हैं, दूसरीओर बैंकों में खासकर ग्रामीण क्षेत्र की बैंकों में सही-सलामत शौचालय तक नहीं रहता। ज्यादातर बैंकों में नाम का शौचालय है, जो किसी काम का नहीं है। वहां न पानी रहता है, न साफ-सफाई और न ही ढंग के और मजबूत दरवाजे-खिड़की। शौचालय का फर्श भी एकदम गंदा और बदबूदार। ये शौचालय महज दिखावे के और केवल पुरुष कर्मचारियों के काम का होता है। यदि किसी महिला कर्मचारी-अधिकारी को कोई इमेरजेंसी हो गई, तो उसे दूर जंगल में, नदी-तालाब किनारे या फिर किसी रहवासी के घर में जाना पड़ता है।
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