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बेखौफ दरिंदे-वीरेंद्र देवांगना

बेखौफ दरिंदेःः
अदालतोें के द्वारा दुष्कर्म को ‘रेयर आफ रेयरेस्ट’ केस मानने और ‘निर्भया’ के कातिलों को शूली पर लटकाने के बाद लगने लगा था कि बलात्कार अब बीते दिनों की बात हो जाएगी। लेकिन नहीं, यह मुगालता ही है।
चाहे देश में कितना ही कड़क कानून बन जाए और बलात्कारियों को फांसी पर चढ़ाया जाए, समाज में ऐसे शैतानी प्रवृति के लोग अब भी मौजूद हैं, जो अपनी मानसिकता बदलने के लिए तैयार नहीं हैं। आज भी वे लड़कियों के जिस्म के साथ खिलवाड़ करने से नहीं चूकते।
ताजा उदाहरण है उप्र के हाथरस का, जहां 19 वर्षीय सामूहिक दुष्कर्म पीड़िता दो सप्ताह तक संघर्ष करने के बाद जिंदगी की जंग हार गई। वह दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में दम तोड़ दी। वहीं अस्पताल प्रशासन का कथन है कि गला दबाए जाने से रीढ़ की हड्डी टूटने, दिल का दौरा पड़ने और फेफड़ों के काम न करने के कारण पीड़िता की मृत्यु हो गई।
स्वजनों का आरोप है कि पीड़िता का सही समय पर सही इलाज नहीं हुआ। इसके पूर्व उसे अलीगढ़ के मेडिकल कालेज अस्पताल में भरती कराया गया था।
सवाल यह भी कि सामूहिक दुष्कर्म 14 सितंबर को हुआ, तब तक पुलिस प्रशासन क्या करता रहा? सुना तो यहां तक जाता है कि यह मामला पुलिस की ढीलपोल का भी है। चूंकि मामला दलित युवती का था, इसलिए पुलिस ढीलाढाला रवैया अपनाती रही। यदि पुलिस मुस्तैदी दिखाती, तो जहां पीड़िता का सही समय पर सही इलाज हो जाता, वहीं पीड़िता बच सकती थी।
जिस पुलिस की जवाबदेही दुष्कर्म को रोकने की है, वह दुष्कर्म को रोकना तो दूर, समय पर रपट लिखकर धरपकड़ तक नहीं करती। लेकिन, शवदहन में मुस्तैदी दिखाती है, ताकि मामले को रफा-दफा किया जा सके
चिंताजनक तो यह भी कि यह घटना उस उप्र में हुई है, जहां के मुख्यमंत्री ने ‘आपरेशन दुराचारी’ चला रखा है। अब तो दुष्कर्म के मामले में अभियुक्तों को तब तक दोषी माना जाना चाहिए, जब तक कोर्ट उसे निर्दोष न साबित कर दे।
पीड़िता के आरोपित हैं-लवकुश, रामकुमार, रवि और संदीप, जिन्हें काफी मशक्कत के बाद जेल भेजा गया है। इस घटना की निंदा कांग्रेस नेता राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा, अभिनेता अक्षय कुमार, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव, बसपा अध्यक्ष मायावती, राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा, भीम आर्मी के अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद आदि ने की है। वहीं, घटना सोशल मीडिया में दिनभर ट्रेंड करता रहा।
व्यापक विरोध के दृष्टिगत योगी सरकार आननफानन में एसआईटी का गठन करी है और परिवार को 25 लाख रुपए, एक स्वजन को सरकारी नौकरी व शहर में घर देने की घोषणा की है, जो मामले को तूल न देने की गरज से किया गया प्रतीत होता है।
हालिया ऐसा ही वाकिया उप्र के बलरामपुर व राजस्थान के बारां और तमाम राज्यों में हुआ, लेकिन हाथरस ने सुर्खिंयां बटोरी, तो इसका कारण उसका राजनीतीकरण है। देश में सैकड़ों युवतियों के साथ रोजाना दुष्कर्म होता रहता है, लेकिन तमाम मामलों में आश्चर्यजनक रूप से चुप्पी साध लिया जाता है। यह इस देश की भयावह विडंबना है कि ‘तेरी सरकार और मेरी सरकार’ की ओछी भावना ने देश को बांट रखा है, जिसका परिणाम देशवासी भुगत रहे हैं।
सबसे बड़ी समस्या यह कि देश में दुष्कर्म के मामले में सजा का प्रतिशत मात्र 25 से लेकर 30 है। इसका कारण यह कि पीड़ित पक्ष के लोग लंबे चलनेवाले मुकदमों में डराने-धमकाने से अपना बयान बदल देते हैं। गुनेहगार जमानत पर जेल से छूट जाते हैं और समाज में कानून-व्यवस्था का मखौल उड़ाने लगते हंै। कई मामलों में जांच एजेंसियों को बंधकर काम करना पड़ता है। राजनीतिक आकाओं के इशारे अलग होते है, जो प्रायः आरोपितों के पक्ष में रहते हैं।
महिला अपराध के मामले में आज समाज व परिवार का दबाव खत्म हो चुका है। कानून का दबाव शेष है, जो पीड़िता को न्याय दिला सकता है। दुर्भाग्य से इस देश में वही दुर्लभ है। है भी, तो लंबे कानूनी दांव-पेंचों के बाद न्याय मिलता है, जैसा कि ‘निर्भया कांड’ में हुआ। तमाम दबाओं के बावजूद ‘निर्भया’ का फैसला आने में सात साल लग गए, तो ऐसे मामलों में न्याय की जल्दी उम्मीद करना बेमानी है।
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Virender Dewangana

Virender Dewangana

मैं शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त हूँ। लेखन में रुचि के कारण मै सेवानिवृत्ति के उपरांत लेखकीय-कर्म में संलग्न हूँ। मेरी दर्जन भर से अधिक किताबें अमेजन किंडल मेंं प्रकाशित हो चुकी है। इसके अलावा समाचार पत्र-पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं निरंतर प्रकाशित होती रहती है। मेरी अनेक किताबें अन्य प्रकाशन संस्थाओं में प्रकाशनार्थ विचाराधीन है। इनके अतिरिक्त मैं प्रतियोगिता परीक्षा-संबंधी लेखन भी करता हूँ।

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