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कांग्रेस में कलह-वीरेंद्र देवांगना

कांग्रेस में कलह::
करीब एक माह पूर्व कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में 23 प्रमुख कांग्रेसी नेताओं के नेतृत्व परिवर्तन के पत्र को लेकर धमासान हो गया था। वर्तमान अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पत्र का हवाला देकर फौरन इस्तीफे की पेशकश कर दी, तो मनमोहन सिंह, एके एंटोनी आदि नेताओं के मान-मनौव्वल के उपरांत फिर अंतरिम अध्यक्ष बनने के लिए राजी हो गई।
चिट्ठीबाज प्रमुख नेताओं में हैंः-कांग्रेस के राज्यसभा के नेता प्रतिपक्ष-गुलाम नबी आजाद, कपिल सिब्बल, आनंद शर्मा, मनीष तिवारी, शशि थरूर, वीरप्पा मोइली, विवेक तन्खा, मुकुल वासनिक आदि।
वहीं चिट्ठीबाजी की टाइमिंग पर पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रश्न उठाया,‘‘जब मां अस्पताल में थी, तभी चिट्ठी क्यों लिखी? चिट्ठी ऐसे समय लिखी, जब राजस्थान में सरकार संकट में है। चिट्ठी में उठाए गए मुद्दों पर चर्चा की सही जगह कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक है, न कि मीडिया। यह पत्र भाजपा से मिलीभगत कर लिखा गया है।’’
जब कपिल सिब्बल व गुलाम नबी आजाद पर भाजपा से सांठगांठ का आरोप लगा, तब कपिल सिब्बल ने ट्वीटर पर ट्वीट कर कहा कि मैंने मणिपुर व राजस्थान सरकार के बचाव के लिए कांग्रेस से वफादारी निभाया, लेकिन मुझको यह सिला मिला। मैं राजस्थान हाईकोर्ट में कांग्रेस का पक्ष रखते हुए सफल हुआ। मैंने भाजपा के पक्ष में कोई बयान नहीं दिया।
वहीं जब उनसे राहुल गांधी ने फोन पर बात की, तो उन्होंने यू-टर्न लेते हुए अपना ट्वीट वापस ले लिया और कहा, ‘‘यह सब गलतफहमी की वजह से हो गया है।’’ यह कैसा कच्चापन है? यह तो पार्टी के नेताओं की अगंभीरता को उजाकर करता है।
दूसरी ओर गुलाम नबी आजाद ने भी यू-टर्न ले लिया। जबकि उन्होंने भाजपा के साथ मिलीभगत साबित करने पर पार्टी के तमाम पदों से इस्तीफा देने की बात तक कही थी।
कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में चार प्रमुख मुद्दों पर चर्चा किया जाना था, लेकिन आपसी कलह की वजह से चर्चा नेतृत्व परिवर्तन के इर्द-गिर्द सिमटकर रह गई। ये प्रमुख मुद्दे थे-कोरोना संकट, गिरती अर्थव्यवस्था, बेरोजगारी और चीनी घुसपैठ।
सवाल यह कि उस कांग्रेस का क्या होगा, जो भारतीय लोकतंत्र का मुख्य विपक्षी दल है? वह न नेतृत्व में फेरबदल को स्वीकार कर पा रही है, न देश को सबल विपक्ष होने का संदेश दे पा रही है। वह उन मुद्दों को भी प्रबलता के साथ उठाने में सक्षम नहीं है, जिसका संबंध राष्ट्रहित से है। यह तो खोदा पहाड़ और निकली चुहिया हो गई। वह भी मरी हुई।
दरअसल, जिस पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र ही न हो, उस पार्टी से क्या उम्मीद की जा सकती है कि वह देश में सच्चे लोकतंत्र की स्थापना करेगे? यह मुहिम परिवारवाद के खिलाफ भी था, जिसका रोग एकाध पार्टी को छोड़कर प्रायः सभी पार्टियों को लगा हुआ है।
जबकि 23 प्रमुख नेताओं की चिट्टी लिखने की मंशा यही थी कि ऊपर से नीचे तक 135 साल पुरानी पार्टी में आमूलचूल परिवर्तन कर पार्टी को सशक्त बनाया जाए। केंद्र व राज्यों के दलाध्यक्ष फूल टाइमर हों, जो हर समय पार्टीहित में काम करने के लिए आतुरता व निष्ठा दिखाएं।
हालांकि यह भी कटुसत्य है कि चिट्ठी पर हस्ताक्षर करनेवाले अधिकांश नेता जनाधारविहीन हैं। इनमें से कइयों ने कभी आम चुनाव नहीं लड़ा और नेतृत्व के प्रसादस्वरूप राज्यसभा सदस्य बने हुए हैं।
इसी तथ्य की ओर इंगित करते हुए राहुल गांधी ने 2019 की हार स्वीकार करते हुए कहा था कि मैंने तो जिम्मेदारी लेते हुए अध्यक्ष पद छोड़ दिया, लेकिन बाकी लोगों ने क्या किया? सच्चाई यही कि बाकी लोगों ने अंतरिम अध्यक्ष की उंगली पकड़कर पहुंचा पकड़ लिया।
कांग्रेस में यह पहला अवसर नहीं, जब शीर्ष नेतृत्व को चुनौती दी गई हो। पंडित जवाहरलाल नेहरू को आचार्य जेबी कृपलानी और पुरुषोत्तम दास टंडन से चुनौतियां मिलीं थी। वहीं श्रीमती इंदिरा गांधी को के कामराज, मोरारजी देसाई, बाबू जगजीवन राम, अर्जुनसिंह व एनडी तिवारी ने झटका दिया था। यही नहीं, राजीव गांधी को वीपी सिंह ने बोफोर्स के मुद्दे को गरमाकर सीधे धेराबंदी कर दी थी।
सवाल यह भी नहीं कि कब क्या हुआ था? तब केंद्रीय नेतृत्व दमदार था और पार्टी का जनाधार देशभर में था। आज नेतृत्वविहीनता व दिशाहीनता की वजह से पार्टी तेजी से देश में अपना जनाधार खो रही है। ऐसे संकट के समय में पार्टी को कौन दिशा और सही नेतृत्व दे सकता है? यह यक्ष प्रश्न-सा है, जिसका उत्तर निकट भविष्य में पार्टी को ढूंढना ही पड़ेगा।
पार्टी के कई चापलूस टाइप नेता अभी तक गांधी परिवार को ही पार्टी का असल खेवनहार मार रहे हैं। उनका दावा है कि उनके बिना पार्टी अस्तित्वविहीन हो जाएगी। जबकि कतिपय अन्य नेता यह शिगूफा भी छोड़ रहे हैं कि गांधी परिवार से बाहर का व्यक्ति भी पार्टी का अध्यक्ष बन सकता है।
दरअसल, पार्टी में किसी नेता में दम ही नहीं है, कि वह गांधी परिवार की बैशाखी के बिना एक कदम चल भी सके। इसलिए लगता है-जिस कांग्रेस पार्टी का निर्माण एक विदेशी ने 1885 में किया था, उसी को एक विदेशी के हाथों ध्वंस करना भर रह गया है।
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Virender Dewangana

Virender Dewangana

मैं शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त हूँ। लेखन में रुचि के कारण मै सेवानिवृत्ति के उपरांत लेखकीय-कर्म में संलग्न हूँ। मेरी दर्जन भर से अधिक किताबें अमेजन किंडल मेंं प्रकाशित हो चुकी है। इसके अलावा समाचार पत्र-पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं निरंतर प्रकाशित होती रहती है। मेरी अनेक किताबें अन्य प्रकाशन संस्थाओं में प्रकाशनार्थ विचाराधीन है। इनके अतिरिक्त मैं प्रतियोगिता परीक्षा-संबंधी लेखन भी करता हूँ।

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