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कोरोना के लिए वायु प्रदूषण घातक::-वीरेंद्र देवांगना

कोरोना के लिए वायु प्रदूषण घातक::
सबको पता है कि कोरोना वायरस मानव के फेफड़े पर प्रहार करता है और उसको क्षत-विक्षत कर सांस को रोक देता है, इसलिए दम घुटने से कोरोना संक्रमितों की मौत हो जाती है।
फेफड़ा कमजोर तब होता है, जब इंसान शराब, सिगरेट, गांजा, बीड़ी, तंबाकू खाता-पीता है, जिसे हम इंसानी व्यवसन कहते हैं, लेकिन एक कारण और है, जिससे इंसान का फेफड़ा प्रदूषण का शिकार हो सकता है, वह है वायु प्रदूषण।
वायु प्रदूषण यद्यपि मानव-निर्मित है, तथापि यह व्यवस्थागत खामियों व कमजोरियों की वजह से परवान चढ़ता है, जिससे निर्दोष लोग बेमौत मारे जाते हैं। गंदी आदतों के साथ वायु प्रदूषण का मिलना, कोढ़ में खाज है, जो व्यापक मौत का कारण बन सकता है।
देश में वायु प्रदूषण के गिने-चुने कारक हैं-परालीदहन, वाहनों का ईंधन, लकड़ी का जलना, उद्योगों का धुंआ, निर्माण कार्यों व सड़कों से उठनेवाले धुंए, डीजल पंपचालन और बढ़ती आबादी आदि।
इसमें भी परालीदहन एक ऐसा मामला है, जिसपर कई वर्षों से सरकारों का ध्यान सुप्रीमकोर्ट के द्वारा खींचा गया है, लेकिन न परालीदहन कम हो रहा है, न प्रदूषण। खासकर पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, पश्चिमी उत्तरप्रदेश और अन्य उत्तरी राज्यों में हालात बद-से-बदतर हैं, जहां दिन-दहाड़े पराली जलाई जाती है और सरकारें बहाने गड़ती रहती हैं।
इसी से व्यथित होकर शिखर कोर्ट को एक जनहित याचिका में कटाक्ष करना पड़ा है कि क्या पराली जलाने से कोरोनावायरस मर जाएगा?
जबकि वल्र्ड क्वालिटी प्रतिवेदन कहती है कि दुनिया के 10 सबसे प्रदूषित शहरों में-से भारत के छह हैं। यह आंकड़ा तब और भयावह है कि जब कहा जाता है कि भारत में दम घुटने से हर साल 12.50 लाख लोगों की मौत हो जाती है।
यही नहीं, विश्व स्वास्थ्य संगठन कहता है कि भारत के शहरों में पीएम 2.5 का स्तर मानक से 300 से लेकर 500 फीसद अधिक है, तब तो सरकारों को चेत जाना चाहिए कि प्रदूषण भारतीय जिंदगियों के लिए कितना घातक व जानलेवा है।
भारत में जहां देश की राजधानी दिल्ली सर्वाधिक प्रदूषित है, वहीं गुरुग्राम, फरीदाबाद, पटना, गया, मुजफ्फरपुर, पटियाला, लखनऊ, वाराणसी, कानपुर, आगरा आदि भी भयावह प्रदूषण की मार झेल रहे हैं। इनमें से ज्यादातर शहर यूपी व बिहार के हैं।
आबोहवा अशुद्ध होने से मानव के अंग-उपांग दूषित हो जाते हैं, जिसका मापन पीएम 2.5 एवं पीएम 10 से किया जाता है। पीएम 2.5 वह कण है, जिसका व्यास 2.5 माइक्रोमीटर से कम होता है। ये इतने महीन होते हैं, इन्हें सिर्फ इलेक्ट्रान सूक्ष्मदर्शी से देखा जा सकता है।
इसी तरह पीएम 10 भी सूक्ष्म कण होते हैं, जिनका व्यास 2.5 से 10 माइक्रोमीटर तक होता है। वायु प्रदूषण के कारकों से सल्फर डाइआक्साइड, ओजोन प्रदूषण और कार्बन मोनोआक्साइड का निष्क्रमण होता है।
ये बारीक कण ह्दय में जलन, फेफड़ों का निष्क्रमण, अस्थमा का परिसंचरण कर आक्सीजन की मात्रा को कम कर देते हैं, जिससे इंसान की मौत हो जाती है।
इसके बावजूद, सरकारों के कानों में जूं तक नहीं रेंग रही है। वे बस आदेश फरमाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं और प्रदूषण जस-का-तस रहकर अपना कहर बरपाता रहता है।
इसके लिए वे राज्य सरकारें जिम्मेदार हैं, जिनके यहां प्रदूषण विकराल है। केंद्र सरकार या केंद्रीय एजेंसियां इसके नियंत्रण के लिए योजनाएं बना सकती हैं। लेकिन योजनाआंे को लागू करना, राज्य सरकारो का काम है। वे निहित स्वार्थो और वोटबैंक के दरकने के डर से सख्त कदम नहीं उठातीं।
इसलिए कहा जा सकता है कि कोरोनावायरस के फैलाव के संदर्भ में वायु प्रदूषण एक तो करेला, दूजा नीम चढ़ा बन गया है।
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Virender Dewangana

Virender Dewangana

मैं शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त हूँ। लेखन में रुचि के कारण मै सेवानिवृत्ति के उपरांत लेखकीय-कर्म में संलग्न हूँ। मेरी दर्जन भर से अधिक किताबें अमेजन किंडल मेंं प्रकाशित हो चुकी है। इसके अलावा समाचार पत्र-पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं निरंतर प्रकाशित होती रहती है। मेरी अनेक किताबें अन्य प्रकाशन संस्थाओं में प्रकाशनार्थ विचाराधीन है। इनके अतिरिक्त मैं प्रतियोगिता परीक्षा-संबंधी लेखन भी करता हूँ।

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