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दागियों पर दाग के मामले-वीरेंद्र देवांगना

दागियों पर दाग के मामले::
सुप्रीमकोर्ट के जस्टिस एनवी रमना की अध्यक्षता वाली पीठ ने असंतोष व्यक्त करते हुए कहा है कि देशभर के अदालतों में लंबित 4,400 से ज्यादा वर्तमान एवं पूर्व सांसदों-विधायकों के आपराधिक मामलों में सुनवाई में तेजी लाने और फैसला सुनाने की दरकार है।
न्यायमूर्ति रमना को यह ज्ञान तब मिला, जब कलकत्ता हाईकोर्ट के एक अधिवक्ता ने बंगाल के एक पूर्व विधायक के खिलाफ 35 साल से अधिक वर्षों तक लंबित मामले की ओर ध्यानाकर्षित किया।
गौर करनेवाली बात यह भी कि 14 दिसंबर 2017 को सुप्रीमकोर्ट ने वर्तमान व पूर्व सांसदों-विधायकों के मामलों को निपटारे के लिए देशभर में विशेष अदालतें गठित करने तथा हाईकोर्टों के मुख्य न्यायाधीशों से पीठों की अध्यक्षता करने के लिए कहा था।
सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व में भी अहम फैसला सुनाते हुए दागी नेताओं के लिए संसद व विधानसभाओं के दरवाजे बंद करने को कहा था। उन्होंने आदेश दिया था कि उम्मीदवार नामांकन भरते समय फार्म में शिक्षा, उपलब्धि, चयन का आधार, संपत्ति और मोटे अक्षरों में आपराधिक रिकार्ड का ब्योरा देंगे।
राजनीतिक दल आपराधिक रिकार्ड सहित सारा ब्यौरा पार्टी की वेबसाइट, फेसबुक और ट्विटर पर डालेंगे। राजनीतिक दल यह भी बताएंगे कि उम्मीदवार के खिलाफ किस तरह का मामला किस कोर्ट में लंबित है? उसका केस नंबर क्या है और अदालत ने आरोप तय किए हैं या नहीं? इसी तरह यह ब्योरा दो न्यूजपेपर व दो न्यूज चैनल-एक राष्ट्रीय, एक स्थानीय को देंगे।
राजनीतिक दल यह भी खुलासा करेंगे कि उन्होंने आपराधिक पृष्ठभूमि के व्यक्ति को उम्मीदवार क्यों बनाया? जिनकी आपराधिक पृष्ठभूमि नहीं है, उन्हें उम्मीदवार क्यों नहीं बनाया?
कोर्ट का कहना है कि राजनीतिक दल इस बात का कोई स्पष्टीकरण या जवाबदेही नहीं रखते कि उन्होंने पहले स्तर पर ही आपराधिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवार का चयन क्यों किया? इसलिए संविधान के अनुच्छेद 129 और 142 की शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए पार्टियों को दिशा-निर्देश जारी किया गया है।
ऐसा अहम फैसला न्यायमूर्ति आरएफ नरीमन और एस रवींद्र भट की पीठ ने इसलिए सुनाया, क्योंकि 25 सितंबर 2018 के पांच जजों की संविधान पीठ के फैसले का अनुपालन केंद्र सरकार और चुनाव आयोग ने नहीं किया।
इसपर व्यथित भाजपाई नेता और वकील अश्वनी कुमार उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दाखिल की थी। उल्लेखनीय है कि पांच जजों की पीठ में न्यायमूर्ति जस्टिस नरीमन भी शामिल थे।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि संबंधित राजनीतिक दल उम्मीदवार चयन के 72 घंटे में आदेश के अनुपालन की रिपोर्ट चुनाव आयोग को देंगे। उम्मीदवार चयन के 48 घंटे के भीतर यह ब्योरा वेबसाइट पर डाल दिया जाएगा या नामांकन की पहली तारीख से दो सप्ताह के भीतर प्रकाशित किया जाएगा।
गर राजनीतिक दल यह रिपोर्ट आयोग को देने में नाकाम रहते हैं, तो आयोग इसे सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में लाएगा। इसका पालन नहीं करना आदेश की अवहेलना होगा।
यह फैसला उन तथ्यों से उभरकर सामने आया, जो आंखें खोलनेवाला है और गणतंत्र के प्रत्येक प्रहरी व हितैषी को व्यथित करता है। तथ्य है कि लगातार चार आम चुनाव में दागियों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हुई है।
एसोसिएशन फार डेमोक्रेटिक रिफाम्र्स और इलेक्शन वाच द्वारा 2004 लोकसभा चुनाव के बाद सभी चुनावों का अध्ययन किया। इसमें 62 हजार से अधिक उम्मीदवारों के शपथपत्रों के विश्लेषण के बाद उन्हें राजनीति में अपराधीकरण का खतरनाक चेहरा दिखा।
2004 के आमचुनाव में आपराधिक पृष्ठभूमि के व्यक्तियों की संख्या जहां 24 प्रतिशत थी, वहीं 2009 में बढ़कर 30, 2014 में 34 और 2019 में 43 प्रतिशत हो गई। यानी की लगभग आधे से थोड़े कम सांसद या तो बलात्कारी हैं, सजायाफ्ता हैं, हत्यारे हैं, या आर्थिक अपराधी, डकैत, तस्कर, कालाबाजारी व काले कारोबारी हैं।
आपराधिक लोग सभी पाटियों में सभी प्रदेशों में हैं। इनसे कोई पार्टी और प्रदेश बचा नहीं है। ऐसे लोग ‘पार्टी विद डिफरेंस’ का नारा लगानेवाली भाजपा में भी हैं, तो ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ और राजनीति बदलने का शिगुफा छोड़कर सत्ता में आई ‘आप’ में भी हैं। देश में सर्वाधिक समय तक राज करनेवाली कांग्रेस में ऐसे तत्व हैं ही, बसपा, सपा, तृकां, राकांपा, शिवसेना, राजद, बिजद, द्रमुक, अन्नाद्रमुक आदि पार्टियां भी इनसे बचे नहीं हैं।
छग प्रदेश में 90 सदस्यीय विधानसभा में 27 फीसद से अधिक दागी विधायक हैं। यहां दिसंबर 2018 में संपन्न विधानसभा चुनाव में 1258 प्रत्याशी मैदान में थे, जिनमें से 146 ने अपने चुनावी शपथपत्र में अपने खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज होने की जानकारी दी थी। इसमें कांग्रेस ने 25 लोगों को टिकट दिया था, जिसमें से 19 चुनाव जीत चुके हैं। भाजपा ने 06 लोगों को टिकट दिया था, जिनमें से 03 जीते हैं। जकांछ ने 18 लोगों को टिकट दिया था, जिसमें से 02 जीते हैं। बसपा ने 06 लोगों को टिकट दिया, लेकिन कोई नहीं जीता।
दिल्ली विधानसभा में चुनकर आए 70 में से 37 विधायकों (53 फीसद) पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं।
2018 में सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने एक हलफनामा पेश कर बताया कि देशभर में कुल 1765 सांसद व विधायक हैं, जिनके ऊपर विभिन्न अदालतों में 3045 आपराधिक मामले दर्ज हैं। दरअसल, राजनीति को हींग लगे न फिटकरी, रंग चोखा जाए माननेवाले लोग राजनीति के पेशे में तेजी से प्रविष्ट हो रहे हैं। बगैर निवेश और न्यूनतम जोखिम से ज्यादा रिटर्न देनेवाले इस लाभदायक पेशे में वे जनता का भला किस तरह कर सकते हैं?
जर्मनी के समाजशास्त्री मैक्स वेबर ने कहा है,‘‘राजनीति में आने की दो वजहें हैंः-या तो लोग राजनीति के लिए जीते हैं या फिर राजनीति पर जीते हैं।’’
पार्टियां आपराधिक छवि के लोगों को टिकट इसलिए देती हैं, क्योंकि यहां मांग व आपूर्ति का समीकरण चलता है। ऐसे लोग पार्टी को जीभर कर चंदा देते हैं। निश्चय ही धन दो नंबरी होता है, जो रिटर्न गिफ्ट के रूप में टिकट प्राप्ति की गारंटी देता है।
आशय यह कि संविधान के अनुरूप सुप्रीम कोर्ट की मंशा है कि आपराधिक गतिविधियों में लिप्त रहे व्यक्तियों को लोकतंत्र के मंदिरों में पहुंचने से रोकने की जिम्मेदारी जहां सरकार व चुनाव आयोग की है, वहीं राजनीतिक पार्टियों की भी है।
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