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स्त्री जाति से भेदभाव क्यों -आनंद मिलन

भारत को मातृ प्रधान देश कहा जाता है । क्योंकि माता को पिता से उच्च श्रेणी में रखा गया है। स्त्री जाति बच्चा जन्म देने में सक्षम होती है, ताकि पुरुष का वंश चलता रहे। क्या स्त्री की अधिकार सिर्फ बच्चे पैदा करना और रसोईघर तक ही सीमित है ?
कहा जाता है कि हर कामयाब पुरुष के पीछे, एक नारी का हाथ होता है। जिस गुरु के सीख से एक पुरुष कामयाब होता है। क्या उस गुरु की आजादी घर के दरवाजे तक ही सीमित है ?
सभी धर्मों में भले ही स्त्री को संमान दिया गया हो। मगर अनंतकाल से स्त्री जाती को भोग – विलास की वस्तु ही समझा गया है। जिस कारण स्त्री जाति पर अत्याचार किया जा रहा है।
आधुनिक युग में भी टेलीविजन और समाचार पत्र में विज्ञापनों द्वारा अधिक से अधिक स्त्री अंगों का प्रदर्शन किया जाता है । यानी आधुनिक युग में भी यही कहा या दिखाया जाता है कि महिलाएँ भोग – विलास की वस्तु है, भले ही कहने और दिखाने का तरीका अलग हो ?
हम ये भूल जाते हैं कि जिस स्त्री जाति पर इतना अत्याचार और हूकुमत कर रहे है। आखिर उसी स्त्री जाति ने हमें नौ माह अपने गर्भ में पाल – पोस कर इस जमीन पर लाती है।
फिर हमें उसी स्त्री जाति से माँ , बहन, भाभी और पत्नी का प्यार मिलता है। राह चलते स्त्री जाति को बड़े शौक से देखकर न जाने मन में कितने ही अश्लील विचार पैदा करते हैं। लेकिन कभी अपने गिरेबान में झांक कर नहीं देखते कि अपनी भी माँ – बहन सड़क पर चलती है ?
पुरुष अभी तक स्त्री का एक ही रूप देख पाया है। वह है, ममता और प्यार का। लेकिन पुरुष ये बात भूलने की कौशिश कर रहा है कि स्त्री का दूसरा रूप काली और दुर्गा का है ।
स्त्री जब प्रतिशोध की ज्वाला में जलती हुई, अपने हक के लिए सड़क पर निकलती है। तो दुनिया की कोई शक्ति उसे नहीं रोक पाती ?
शायद इसलिए भगवान शंकरजी को कालीजी के पांव के नीचे लेटना पड़ा। कारण जो भी हो ? लेकिन एक स्त्री जाति का दूसरा रूप उन्होंने देख लिया।
तुलसीदास और वेदव्यास ने जो कुछ भी रामायण और महाभारत में लिखा है। आज कलयुग में सब सत्य हो रहा है। परंतु सीता माता कुछ भूल कर बैठी ? उन्होंने कुछ ज्यादा ही पतिव्रता दिखला दी ? उन्होंने भारत की सुसंस्कृति और नारी सभ्यता की लाज रखी। लेकिन उनकी सीख आज की स्त्री जाति को कमजोर कर रही रही है, और पुरुष वर्ग उस कमजोरी का फायदा उठा रहा है ।
आज भले ही देश का कानून स्त्री – पुरुष को समानता का अधिकार दे रहा हो। फिर भी दोनों को देखने में भेदभाव क्यों हो रहा है ?
हमें इस परिपाटी को बदलना होगा। और समय के माँग के हिसाब से स्त्री जाति को वह सब अधिकार देना होगा जिसका वह हकदार है।
हम सभी लोग अच्छी तरह जानते है कि इंजन के बिना डिब्बों की संख्या बेकार है। और डिब्बों के बिना इंजन बेकार है। अतः दोनों का तालमेल होना अति आवश्यक है।
स्त्री जाति का मनोबल यह कह कर नहीं गिराना चाहिए कि तुम स्त्री हो ? तुम कुछ नहीं कर सकती, या फिर तुम्हारा अधिकार सिर्फ बच्चे को जन्म देना और रसोईघर संभालना है।
बल्कि यह कह कर उसका मनोबल बढ़ाना चाहिए कि तुम हर ओ काम कर सकती हो, जो काम एक पुरुष कर सकता है। चोली दामन के तरह स्त्री – पुरुष को एक साथ चलना होगा, या यूँ कहे कंधे से कंधा मिला कर चलना होगा।
इसी में दोनों की भलाई है, समाज और देश का भलाई है। और आने वाली पीढ़ी की भी। फिर वो दिन दूर नहीं कि 2022 तक भारत विकसित देशों के कतार में खड़ा दिखाए दे और डा अब्दुल कलाम का सपना साकार हो।

 

Anand Milan

 

आनंद मिलन

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Manisha Rani

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2 thoughts on “स्त्री जाति से भेदभाव क्यों -आनंद मिलन”

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