जात के भरोसे-आनंद मिलन

जात के भरोसे-आनंद मिलन

मुझे बड़ायकीन था कि मैं परिक्षा में वक्त से 30 मिनट पहले अपने घर से निकलुंगा, तो कॉलेज में परिक्षा शुरू होने से दस मिनट पहले पहुँच जाऊँगा l लेकिन इस बार मेरे साथ बहुत ही अजिब खेल तकदीर ने खेला ? मैं रोज की तरह आज भी 30 मिनट पहले अपने घर से निकला था l पर कुछ सेकंड देर होने के कारण मेरे हाथ से बस छूट गई थी। मैंने बस पकड़ने की बहुत कोशीश की, पर मैं नाकाम रहा। अब मेरे मन में अलग – अलग विचार आने लगे, मुझे लगने लगा अब मेरा पेपर छुट जायेगा ? मेरा एक साल बरबाद हो जायेगा ?
कुछ अच्छे बुरे ख्याल मेरे दिमाग में आने लगे, तभी मुझे लगा की रास्ते से जानेवाली गाड़ियों को हाथ देकर रूका लू। मैंने गाड़ीयो को हाथ देना शुरु किया। मगर कोई गाड़ी वाला कहता “मुझे यही सामने जाना है’ तो ‘कोई बोलता भी नही, ऐसे ही 20-25 गाड़ीया निकल गई। लेकीन कोई नही रुका, तभी मुझे अपनी खुद की जाती पर बहुत गर्व था। मैं हिंदू – हिंदू करता रहा l उस वक्त मेरे दिमाग मे सिर्फ अपने जाति का रंग छाया था। मैंने जितने भी लोगों को गाड़ीया रुकवाने के लिए हाथ दिया था l वो उनकी गड्डीयोके सामने लगाए हुए छत्रपती शिवाजी महाराज की तस्वीरे या कोई अच्छि line लिखी देखकर वो हिंदू है l जरूर रुकेंगे ? इस उम्मीद पर मैंने उनको हाथ दिया रुकने के लिए मगर वह रूके नहीं।
मैं शुक्रिया करना चाहूँगा उस व्यक्ती का जिनका नाम तक मुझे मालूम नहि वो इंसान मेरे लिए उस वक्त फरिसता बनकर आया था।उनकी गड्डी पर कुछ हरे रंग से उर्दू मे लिखा था। और उनकी दाढ़ी बढी थी। और सर पे गोल टोपी थी, वह एक मुसलमान था। सर से लेकर पाव तक वह एक सच्चे मुसलमान था। उन्होने सामने से होकर मुझसे पूछा “कहा जाना है बेटा ? मैंने अपनी परेशानी बताने के बाद उस वयक्ति ने मुझे कॉलेज पर लाकर छोड़ दिया। तबसे मुझे मालूम हुआ यहाँ जात बनाने वाले हम इंसान ही है l तब से मेरी समझ में आया की सबसे बड़ी जात है- इंसानियत तब जाकर मेरी आँखें खुली

 

 

 आनंद मिलनAnand Milan

Anand Milan

मैं आनंद मिलन मुंबई महाराष्ट्र का निवासी हूँ | मैं वीर रस का कवि हूँ | मैं साहित्य लाइव में संपादक के रूप में कार्य कर रहा हूँ |

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