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जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन तृतीय आदेश-2020-वीरेंद्र देवांगना

जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन तृतीय आदेश-2020
जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 5 अगस्त 2019 को लागू होने के एक साल बाद मोदी सरकार ने भूमि स्वामित्व अधिनियम कानूनों में संशोधन करते हुए जमीन के मालिकाना हक से संबंधित 12 कानूनों को निरस्त कर जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन तृतीय आदेश-2020 जारी किया है।
संशोधनों के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर में जमीन के मालिकाना अधिकार, जमीन के विकास, वनभूमि, कृषिभूमि सुधार, जमीन आवंटन-संबंधी सभी कानूनों में जम्मू-कश्मीर का स्थायी नागरिक शब्द हटा दिया है।
आशय यह कि अब देश के अन्य प्रांतों के लोग भी कश्मीर में बस सकेंगे, उद्योग लगा सकेंगे। फैक्ट्री, घर या दुकान के लिए जमीन खरीद सकेंगे। इसके लिए स्थानीय निवासी, नागरिकता, डोमिसाइल होने का सबूत देने की जरूरत नहीं होगी।
वहीं, जम्मू-कश्मीर वन अधिनियम की जगह भारतीय वन अधिनियम ने ले ली है। जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल, मनोज सिन्हा के अनुसार, बाहर की इकाइयां जम्मू-कश्मीर में लगे, इसलिए औद्योगिक भूमि में बाहरी निवेश की जरूरत है। खेती की जमीन राज्य के लोगों के लिए रहेगी।
नींव का पत्थर साबित होंगे ये बदलाव
1. सेना के कोर कमांडर रैंक के अधिकारी के लिखित आग्रह पर अब जम्मू-कश्मीर सरकार किसी भी क्षेत्र को रणनीतिक क्षेत्र घोषित कर सकती है।
2. स्वास्थ्य सेवा एवं चिकित्सा या उच्चशिक्षा के प्रचार-प्रसार क लिए सरकार किसी व्यक्ति विशेष या संस्थान के पक्ष में जमीन के हस्तारण की अनुमति दे सकती है।
3. विस्थापितों और शरणार्थियों के लिए इवेक्यू (पाकिस्तान पलायन कर गए लोगों की संपत्ति) के अधिकार बहाल कर दिए गए हैं। इवेक्यू प्रापर्टी अधिनियम में सिर्फ 1947 के शरणार्थियों को ही उक्त जमीन, मकान या दुकान को किसी दूसरे के नाम पर स्थानांतरित करने या फिर उनका पूर्ण मालिकाना हक प्राप्त करने का अधिकार था। अब वर्ष 1965 और 1971 के शरणार्थियों को भी यह अधिकार प्राप्त होगा।
4. राज्य के बाहर के व्यक्ति को पीढ़ी-दर-पीढ़ी खेती करने के बावजूद जमीन का मालिकाना अधिकार नहीं मिल सकता था। अब ऐसा नहीं होगा।
5. जम्मू-कश्मीर संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम की धारा 139 को समाप्त कर दिया गया है। इसके तहत जम्मू-कश्मीर का कोई नागरिक अपनी जमीन और मकान को किसी को भी संबंधित नियमों के तहत हस्तांतरित कर सकता है।
6. अब जम्मू-कश्मीर में कोई भी किरायेदार उस संपत्ति पर अपने स्वामित्व का दावा ठोक सकता है।
7. सरकारी जमीन पर अब किसी भी तरह के कब्जाधारक को मालिकाना अधिकार नहीं मिलेगा। बल्कि राजस्व बोर्ड और मुख्य नियंत्रक उसे जमीन से बेदखल कर खुद जमीन का कब्जा ले सकेंगे और वह भी बिना नोटिस।
8. सरकारी जमीन के कब्जाने पर 3 साल कैद और 5 से 10 हजार रुपए तक का जुर्माना हो सकता है।
विरोध के स्वर
इस पर पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने विरोधी तेवर दिखाते हुए कहा है कि अधिसूचना मंजूर नहीं। अब जम्मू-कश्मीर बिकने के लिए तैयार है। जमीन के मालिक गरीब की और मुश्किलें बढें़गीं।
इसी तरह का विरोधी बयान पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने भी दिया है,‘‘रोटी और रोजगार मुहैया कराने में विफल भाजपा अब ऐसा कानून बनाकर जनता को धोखा दे रही है। हम विरोध करेंगे।’’
बदलेगी फिजा
ये विरोधी स्वर उनके हैं, जो कश्मीर को अपना जागीर समझते हैं। ये वे स्वार्थी लोग हैं, जो देश के अन्य हिस्सों में जमीन-जायदाद खरीदकर अपना कारोबार कर सकते हैं, लेकिन जब अन्य भारतीयों के लिए जम्मू-कश्मीर में जमीन-जायदाद खरीदने के नियम बनते हैं, तब इनको ‘जम्मू-कश्मीर बिकने के लिए तैयार’ दिखता है। वाह री, ओछी सियासत! तेरा जवाब नहीं।
इसके बावजूद देश को यकीन है कि इससे जम्मू-कश्मीर की फिजा बदल जाएगी। अन्य प्रांतों के लोग वहां जाकर बसने लगेंगे, तो अलगाववाद, आतंकवाद की धार कम होगी और ब्लैकमेल कर मलाई खानेवाले नेताओं का गोरखधंधा चैपट हो जाएगा। नए-नए उद्योग-धंधे खुलने से अर्थव्यवस्था में भारी बदलाव होगा। वे लोग हाशिये में चले जाएंगे, जो कश्मीरियत का छद्म राग अलाप कर कश्मीर को अपना बपौती समझ रहे थे।
एक अनुमान के मुताबिक, भारत के अन्य राज्यों से करीब 10 लाख लोग हरसाल कश्मीर में रोजी-रोटी के लिए जाते हैं। इनके अतिरिक्त केंद्र सरकार के अधिकारी-कर्मचारी, सार्वजनिक उपक्रमों और निजी उद्यमों में कार्यरत लोग हैं, जो जम्मू-कश्मीर में बरसों से रहने के बावजूद मालिकाना हक और स्थायी आशियाना नहीं पा सके हैं। इससे रियल एस्टेट सेक्टर में चमक आ जाएगा।
इसी तरह गोरखा, वाल्मीकि समुदाय और पश्चिमी पाकिस्तान के शरणार्थियों सहित करीब 3 लाख परिवार हैं, जो अब तक अस्थायी थे, वहां स्थायी तौर पर बस जाएंगे। इससे अलगाववादी नारों की तकरीर बदल जाएगी। अलगाववादियों ने कश्मीरी फिजा में जो जहर धोल दिया था कि भारतीयता और कश्मीरियत दो अलग-अलग कौम है, वह बीते दिनों की बात हो जाएगी।
इससे सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षणिक और आर्थिक विविधता का निर्माण होगा। खेलकूद, पर्यटन, व्यापार का विकास होगा, जो मौकापरस्त व पाकिस्तानपरस्त तत्वों के दुस्साहस का दमन करेगा।
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Virender Dewangana

Virender Dewangana

मैं शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त हूँ। लेखन में रुचि के कारण मै सेवानिवृत्ति के उपरांत लेखकीय-कर्म में संलग्न हूँ। मेरी दर्जन भर से अधिक किताबें अमेजन किंडल मेंं प्रकाशित हो चुकी है। इसके अलावा समाचार पत्र-पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं निरंतर प्रकाशित होती रहती है। मेरी अनेक किताबें अन्य प्रकाशन संस्थाओं में प्रकाशनार्थ विचाराधीन है। इनके अतिरिक्त मैं प्रतियोगिता परीक्षा-संबंधी लेखन भी करता हूँ।

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