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जीवन सत्य-पसंदीदा

माधुरी और उनके पति रमेश दोनों की आय अधिक नहीं थी दोनों किसी तरह अपनी छोटी सी आय में गुज़र बसर कर रहे थे, उनके 4 बच्चे 2बेटी और दो बेटे थे। बच्चों को पढ़ाने और उनके शौक पूरे करने मे ना जाने दोनों काफी दूर हो चुके थे, मतलब दोनों के पास एक दूसरे के लिए टाइम ही नहीं था, हालांकि कभी कभी दोनों एक दूसरे के साथ यादगार निजी क्षण बिताना चाहते, लेकिन महंगाई बढ़ते खर्च के कारण संभव न था, ; दोनों के बीच बचा था बस खर्चों का हिसाब किताब और झगड़े।… झगड़े भी आपसी नहीं, बस घर खर्च के।
जिंदगी तेजी से बीत रही थी, बेटे के बड़े हो जाने के कारण बिज़ीनेस कराने के लिए रमेश ने पैसे दिया , लेकिन काम नहीं चल पाया बेटे का, अब वो अपना काम बंद करके कहीं नौकरी पे लग गया।
दूसरे बेटे को उन्होंने बाहर भेज कर अच्छी पढाई कराई, किसी ने माधुरी से कहा था बेटे को बाहर कहीं पढ़ने भेजो, यहाँ पास मे रहेगा तो ठीक से पढ़ेगा नहीं।
अब छोटा बेटा बाहर चला गया था पढ़ने उसके भी बहुत खर्च थे, वो जब भी कॉल करता पैसे के लिए , माधुरी किसी न किसी तरह पैसे का इंतेज़ाम करके भेजती। बेटा मन लगा कर पढ़ाई कर रहा था।
दो बेटियों की भी पढ़ाई पूरी होने वाली थी, दोनों हालांकि भाईयों से छोटी थी लेकिन माधुरी और रमेश ने लोन लेकर किसी तरह उनकी शादी कर दी थी,
इतनी ज़िम्मेदारियों मे मे पता ही नही लगा टाइम कैसे गुज़र गया। दोनों के बालों में चांदी जैसी लकीरें आ गयी, मतलब बाल सफेद होने लगे ;मगर दोनों अपने समय के सबसे रोमांटिक और सुंदर कपल मे गिने जाते थे ;दोनों के मिलन की बहुत ही इंट्रेस्टिंग कहानियाँ थी; कहा जाता है पहले के ज़माने मे लड़की ज़्यादा पढाई कर ले तो शादी नहीं होती थी, ऐसा कहा जाता था, यही कारण माधुरी के १२वीं की परीक्षा पास करने के बाद माधुरी के पिता उसका रिश्ता एक आढ़ती के बेटे से करा रहे थे, उनका थोक अनाज का व्यापार था, बस एक अच्छी लड़की चाहते थे जो घर संभाले और पैसे भी। लेकिन माधुरी का पढ़ाई का मन था, रमेश माधुरी के बचपन के दोस्त थे, उन्होंने अपने पिताजी को भेजा,ताकि वो माधुरी के पिताजी को समझाए कि वो माधुरी को आगे भी पढ़ाये, माधुरी के पिता ने रमेश के पिता से कहा “अगर माधुरी ज़्यादा पढ़ लिख गयी तो पढ़ा लिखा लड़का नहीं मिलेगा”, तब रमेश के पिता ने मज़ाक मे कहा था” आप बिटिया को खूब पढ़ाओ, मै भी अपने बेटे को आपकी लड़की के लायक बना कर, अगर आप चाहेंगे तो दोनों का रिश्ता कर दूंगा “।
इस तरह दोनो की शादी हो गयी थी, दोनों आज अपने उन अच्छे दिनों को याद कर रहे थे रमेश जी ने बातों बातों मे माधुरी को अपने सीने से लगा लिया था, माधुरी ने शर्माते हुए, पीछे हटते हुए कहा था” हटो जी बेटी दमाद वाले हो, अभी ये शोभा नही देता ” । रमेश ने कहा ” मैं आज भी तुम्हे उसी रूप में देखता हूँ, जब तुम मुझे मिली थी। ”

और.. शाम को अचानक दिल का दौरा पड़ने से रमेश हमेशा के लिए जा चुके थे, दोनों को घर की जिम्मेदारियों के कारण एक दूसरे के साथ टाइम बिताने का मौका ही नहीं मिला।
माधुरी की आँखों के सामने रमेश के साथ बिताये एक एक पल एक चलचित्र की भाँति गुज़र रहे थे, उनमें वो पल भी थे जब उन दोनों मे मतभेद हुए थे वो भी बच्चों की जिम्मेदारियों के चलते।
अब माधुरी बिल्कुल अकेली हो चुकी थी , किसी तरह ये खालीपन लेकर अपनी जिंदगी गुज़ार रही थी। अब उसकी आमदनी भी बढ़ गयी थी।
बेटों की शादी भी हो चुकी थी, एक बेटे ने अपनी दुनियाँ किसी और शहर मे बसा ली गई थी, दूसरा बेटा उनके पास था । बेटियां भी शादी के बाद किसी और शहर मे चली गयीं थी।
कभी अपनी सैलरी में माधुरी पूरे घर का खर्च चला लेती थी किसी को किसी चीज़ की कमी नहीं होने देती, अब काफी कमज़ोर होती जा रही थी आये दिन उसकी पेंशन भी कम पड़ जाती इलाज मे।
जब रमेश जीवित थे तो माधुरी को भी लगता था अच्छे अच्छे सुंदर पोशाक पहने, कहीं बाहर घूमने जाये, मगर बच्चों की जिम्मेदारियां मे उन दोनों ने अपनी ख्वाहिशें मार दी थी। अब भी वो घूमना चाहती, खुद पे अपने पैसे खर्च करना चाहती, मगर….!!!! अब उसकी पेंशन जो काफी अच्छी आती थी , वही उसके लिए घातक बन गयी थी, उनकी बेटी भी जो दूसरे शहर में रहती थी, जब भी फोन करती तो पैसे कोई न कोई बहाने मांगती अपनी परेशानी बता कर, और जब माधुरी उससे बोलती की “कभी कभी आकर मेरे पास रहो, मुझे तुम्हारी ज़रूरत है” तो बेटी बोलती मै अपने पति को अकेला छोड़ कर नहीं आ सकती, आप ही मेरे पास आ जाओ। ” ये सुन कर माधुरी चुप हो जाती , क्योंकि वो भी अपना घर छोड़ कर नहीं जाना चाहती थी।
अब माधुरी कभी कभी छोटे बेटे के पास जाना चाहतीं तो वहाँ उनका मन नहीं लगता , छोटी बहु उनका ठीक से देखभाल नहीं करती, वो भी नौकरी करती थी।
बड़ी बहु भी नौकरी करती थी , लेकिन माधुरी से कभी सीधे मुँह बात नही करती,
माधुरी अब काफी कमज़ोर होती जा रहीं थी पैसे उनके पास बहुत थे मगर अब उनकी इतनी ताक़त नहीं थी कि अपने पैसे बैंक से जाकर निकाल सकें। सो उन्होंने अपने बड़े बेटे को ही अपनी पासबुक चेक बुक सब दे दिया था । मगर…. !!! अब भी वो पैसे के लिए तरसती रहतीं। क्योंकि बेटे से जब भी पैसे मांगती, तो वो कहता , फालतू खर्च मत करो, अब भी वो उन चीजों के लिए तरसती जो चीज़े जब बच्चों की जिम्मेदारियों में हासिल नहीं कर पाती थी । बेटियां अपने घर उन्हे हमेशा के लिए रखना चाहती, लेकिन माधुरी ज़माने के उस रिवाज़ और कहावतों से डरती की “बेटियों के घर का पानी नहीं पीना चाहिए”, और अगर दामाद चाहे जितना अच्छा हो, ज़्यादा दिन अपने घर सास को रहने नहीं देता। कभी कभी वो छोटे बेटे को बहू सहित बुलाती हैं वो भी घर खर्च का वास्ता देकर आने से मना कर देता है।। सब बच्चे अपने परिवार की जिम्मेदारियों में व्यस्त हैं जैसे कभी माधुरी और रमेश व्यस्त थे, अकेलापन माधुरी को काटने को दौड़ता है, मगर वो बच्चों को परेशान नहीं करती, क्योंकि…..
यही जीवन सत्य है शायद जो हमेशा होता आया, जाने अंजाने हमेशा होता रहेगा, किसी न किसी परिवार में ।

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