।।मिशन 2019।। – रिया श्रीवास्तव

।।मिशन 2019।। – रिया श्रीवास्तव

राजनीति गरमा-गरम की माहौल देश मे इस समय जोरो-शोरो से है
“सबका साथ सबका विकास” की राह अब टूटती नजर आ रही है। साल 2014 में सत्ता में आने के बाद जिस BJP का एक ही नारा था सबका साथ सबका विकास का, अब वह साथ छूटता और विकास की राह टूटता नजर आ रहा है। अपने ही घर से तिरस्कृत होने के बाद फूलपुर, कैराना और नूरपुर को भी भारतीय जनता पार्टी गंवा चुकी है। 282 सीटों के साथ 2014 में आम चुनाव में अपने बूते पर बहुमत साबित करने वाली भारतीय जनता पार्टी आज पूरी तरह से सिमटते दिख रही हैं। भारतीय जनता पार्टी के लिए सबसे मुश्किल की बात यह है कि साल 2019 में लोकसभा चुनाव से पहले अब तक हुए उपचुनाव में पार्टी 8 सीटो पर अपनी हार दर्ज कर चूंकि हैं। अब देखना यह है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में क्या फिर से सबका साथ सबका विकास का नारा गूँजता है या महागठबंधन की जीत दर्ज होती है। उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा चुनाव में बीजेपी विपक्ष की संयुक्त ताकत के आगे हार गई । आरएलडी की उम्मीदवार तबस्सुम हसन ने बीजेपी के मृगांका सिंह को 47 हजार से ज्यादा वोटों से हरा दिया। वही महाराष्ट्र के पालघर गोंदिया सीट भी BJP हार गयी, यहां पर कांग्रेस के बदौलत एनसीपी ने यह सीट छीन ली।

8 जगहों से हुए बीजेपी के सफाए ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुश्किलें बढ़ा दी है। 56 इंच के सीने की धड़कन अब 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए कुछ ज्यादा ही धड़कने लगी है। अगर यही रणनीति महागठबंधन कि 2019 तक रही तो बीजेपी के पाले में मुश्किलों का बढ़ना तय लगता है। 8 राज्यों में कमल का मुरझा जाना इस बात की ओर संकेत करता है कि 2019 में सबका साथ सबका विकास का नारा शायद ही गूँज पाये। हार के बाद बिगड़े रिश्ते में सुधार होना लाज़मी है । BJP और शिवसेना के बिगड़े रिश्ते इस समय पटरी पर वापस आते दिख रहीं हैं। लोकसभा उपचुनाव की करारी हार ने बीजेपी के मिशन 2019 पर सवालिया निशान लगा दिया है। नए सहयोगी मिलना तो दूर की बात मौजूदा सहयोगी दलों ने ही आंखें दिखाना शुरू कर दिया है।

अब देखना यह है कि शिवसेना और बीजेपी की आपसी ताकत से क्या 2019 में फिर से सबका साथ सबका विकास की राह प्रबल होती है। इन सबके बीच बीजेपी के पाले में एक और मुश्किल दस्तक दे रही है। वह है छोटे भाई और बड़े भाई की आपसी तकरार। नीतीश और उद्धव ठाकरे दोनों चाहते हैं कि बिहार और महाराष्ट्र में BJP उन्हें बड़ा भाई माने । यानी लोकसभा चुनाव में ज्यादा सीटें उन्हें मिले जाहिर है बीजेपी ऐसा नहीं करेगी। अब देखना यह है कि कौन बड़ा भाई साबित होता है और कौन छोटा भाई। क्या बीजेपी मानती है या यह BJP के छोटे भाई बनने के लिए तैयार है।

अगर उपचुनाव के आंकड़ों पर निगाह डाले तो 4 साल में 19 लोकसभा सीट पर उपचुनाव हुए। जिसमें से BJP सिर्फ 5 सीट पर ही जीत हासिल करता है बाकी किसी पर उसे दूसरे तीसरे और कई सीट पर तो चौथे पांचवें स्थान पर ही संतोष करना पड़ा है।

लोकसभा चुनाव के लिए सभी पार्टी क़मर कस चुकी हैं। किसी भी हालत में हार का सामना करने के लिए कोई भी पार्टी तैयार नहीं दिख रही है। जीत हाशिल करने के लिए महागठबंधन तक का रास्ता अपना चुके हैं। वही bjp की लगतार हार का सिलसिला विपक्ष के जीत की उम्मीद बन चुकी हैं। अगर bjp को 2019 में फिर से सत्ता में जगह बननी हैं तो, राजनीतिक रणनीतियो का दूसरा रास्ता अपनाना पड़ेगा। क्योंकि विपक्ष के खेबे में किसान आंदोलन, महंगाई औऱ युवा रोजगार के मुद्दे जोरो से पनप रही हैं वोटरों को बहलाने के लिए।

रिया श्रीवास्तव
वाराणसी, उतर प्रदेश

Ravi Kumar

मैं रवि कुमार गुरुग्राम हरियाणा का निवासी हूँ | मैं श्रंगार रस का कवि हूँ | मैं साहित्य लाइव में संपादक के रूप में कार्य कर रहा हूँ |

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