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मूर्तिभंजन से किसका फायदा-वीरेंद्र देवांगना

मूर्तिभंजन से किसका फायदा::
पूर्वोत्तर राज्यों के चुनाव परिणाम के बाद दक्षिण त्रिपुरा जिले के बेलोनिया सबडिवीजन में तथा सबरूम टाउन में मोटर स्टैंड के पास रूसी क्रांति के महानायक ब्लादिमीर लेनिन की दो प्रतिमा को गिरा दिया गया था।
प्रतिक्रियास्वरूप तमिलनाडु में ब्राह्मणवाद और रूढ़िवाद के खिलाफ सशक्त आंदोलन खड़ा करनेवाले शख्सियत पेरियार की मूर्ति को निशाना बनाया गया। मूर्तिभंजन का यह क्रम यही नहीं थमा। बदले की भावना में तमिलनाडु में ही संविधान निर्माता डा. भीमराव अंबेडकर, पश्चिमी बंगाल में जनसंध के संस्थापक और भाजपा के पितृपुरुष श्यामा प्रसाद मुखर्जी और केरल में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की प्रतिमा पर कालिख पोतने और उन्हें खंडित करने का दुस्साहस किया गया।
यह सच है कि भारत में अलग-अलग पंथ (वामपंथ, दक्षिणपंथ व मध्यमार्गी) मजहब, विचाराधारा और संस्थाएं हैं, जो अनेकता के बावजूद सदियों से एकता के सूत्र में बंधे हुए हैं। इस पुण्यधरा पर महात्मा बुद्ध, महावीर स्वामी, गुरुनानक, कबीर, गुरु घासीदास, चैतन्य महाप्रभु, स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी, डा. भीमराव अंबेडकर, पेरियार, राम मनोहर लोहिया, श्यामाप्रसाद मुखर्जी, आचार्य कृपलानी, जयप्रकाश नारायण जैसे महापुरुष हुए, जिन्होने देश को दिशा दिखाया है। बदले में देश ने उन्हें सिर आखों पर बिठाकर उनका सम्मान किया है।
इसका यह मतलब नहीं कि हम सारी हदें पार कर एक-दूसरे की विचारधारा और आस्था पर कुठाराधात करने के हथकंडे अपनाएं और देश को गृहयुद्ध के आगोश में ढकेलने का प्रबंध करें। एक-दूसरे के पंथ, मजहब और विचारधारा का सम्मान करना ही हमारी सबसे बड़ी थाती है। इसकी अवहेलना, तबाही को आमंत्रित करना है।
इन महापुरुषांे की प्रतिमाएं देश के कोने-कोने में हैं। यदि एक-दूसरे की मूर्ति गिराने का उन्माद और पागलपन देश में फैल गया, तो क्या होगा? देश के नागरिकों की एकता, भाईचारा, आपसी सौहार्द्र, पे्रम सब मटियामेट हो जाएगा। लोग मूर्तियों के बहाने एक-दूसरे के जान के प्यासे होकर मरने-मारने पर उतारू हो जाएंगे, जैसा दंगा-फसाद में हुआ करता है।
संभवतः इन्हीं खतरों को भांपकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सबको आगाह किया है कि कोई ऐसा कृत्य न करे, जिससे हमारी सामाजिक समरसता छिन्न-भिन्न हो। इसके लिए उन्होंने जिले के कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक को जिम्मेदार ठहराया है तथा मूर्तितोड़कों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। ऐसा ही संदेश भाजपाध्यक्ष अमित शाह ने अपने कार्यकर्ताओं व पदाधिकारियों को भी दिया है।
कुछ सियासतदानों की यह दलील भी गले नहीं उतरती कि लेनिन, तो विदेशी होने के साथ-साथ लाखों लोगों के कत्लेआम का आरोपी है। ऐसे व्यक्ति की मूर्ति इस देश में क्यों? अगर यह धारणा है, तो महात्मा गांधी की भी मूर्ति सारे जहां में हैं। कहीं-कहीं तो उसकी इबादत व सजदा करते हैं लोग। इन्ही उन्मादी फितरतों में महात्मा गांधी की मूर्ति विदेशी तोड़ने लगें, तो गांधीवादी और देशभक्त भारतीयों पर क्या गुजरेगी? अमेरिकन राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन व माओत्से तुंग का भी बुत सारी दुनिया में है।
सिनेमा के शौकीनों को संभवतः याद होगा। कुछ साल पहले संजय दत्त अभिनीत फिल्म ‘‘लगे रहो मुन्नाभाई’’ प्रदर्शित हुआ था, जिसमें महात्मागांधी अर्थात बापू ने मुन्नाभाई से कहकर उसकी जिज्ञासा शांत किया था, ‘‘गांधी को और उसके विचारों को याद रखना व मानना है, तो उसके सारे फोटो निकाल दो, नामपट्ट हटा दो, उसकी मूर्तियां मत बिठाओ। इन सब ढकोसलों के बजाय उसको बिठाना है, तो अपने दिल में बिठाओ।’’
वाकई मार्के की बात कही गई है, फिल्म में। लेकिन, हम इन संदेशों को समझकर जीवन में उतारने के बजाय उसको करते हैं, जो हमें मुफीद लगता है। हम किसी महापुरुष की मूर्तियां ही क्यों बनाएं? उसको अपने दिल में बिठाकर उसकी विचारधारा को अपनाएं, तो सारे टंटे टूट जाएंगे। झगड़ा बंद हो जाएगा। दंगा-फसाद थम जाएगा। इसके लिए जो बन चुका है, उसको यथास्थिति रहने दिया जा सकता है और आगे के लिए सचेत रहा जा सकता है।
यकीन मानिए। इस एक विचारधारा से देश में अमनचैन आ जाएगा।
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Virender Dewangana

Virender Dewangana

मैं शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त हूँ। लेखन में रुचि के कारण मै सेवानिवृत्ति के उपरांत लेखकीय-कर्म में संलग्न हूँ। मेरी दर्जन भर से अधिक किताबें अमेजन किंडल मेंं प्रकाशित हो चुकी है। इसके अलावा समाचार पत्र-पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं निरंतर प्रकाशित होती रहती है। मेरी अनेक किताबें अन्य प्रकाशन संस्थाओं में प्रकाशनार्थ विचाराधीन है। इनके अतिरिक्त मैं प्रतियोगिता परीक्षा-संबंधी लेखन भी करता हूँ।

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