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पर्यावरण प्रदूषण का प्रमुख कारण::-वीरेंदर देवांगना

पर्यावरण प्रदूषण का प्रमुख कारण::
विकराल होती जनसंख्याः भारत की जनसंख्या फिलवक्त 135 करोड़ है। इतनी बड़ी जनसंख्या को रोजगार उपलब्ध कराना, उनका रहना-खाना व निस्तार करना एक ऐसी समस्या है, जो नदी-तालाब, कंुआ-बावली एवं वन संपदा तक को दूषित कर रहा है। वन व खेत-खलिहान घटते जा रहे हैं। लोग गांवों से शहरों की ओर रोजगार की तलाश में पलायन कर रहे हैं। फलतः, शहरों में झुग्गी-झोपड़ियां बढ़ रहीं हैं। शहर फैलते जा रहे हैं। शहरीकरण में इजाफा हो रहा है। गंदगीयुक्त पानी नदी-नालों-तालाबों में मिलकर जल व मिट्टी को दूषित कर रहा है।
शहरों के कचरे के उचित निपटान का अभावः देशभर में हजारों की तादाद में नगर पंचायत, नगरपालिका, नगरनिगम और महानगरपालिकाएं हैं। यही नहीं, लाखांें की तादाद में ग्राम पंचायत व गांव हैं। लेकिन इनके कचरों का उचित निपटान न कर उनमें आग लगाया जाता है, जिससे कार्बन डाय आक्साइड, हाइड्रो कार्बन और कार्बन मोनो आक्साइड जैसी विषैली गैसें विसर्जित होकर हवा को जहरीला बनाती है। इसका यदि उचित निपटान किया जाए और इससे विधुत उत्पादन किया जाए एवं कंपोस्ट खाद बनाया जाए, तो प्रदूषण की समस्या का समाधान संभव है।
नरवई को जलाया जानाः इसे कहीं पराली, तो कहीं खड़ भी कहा जाता है। धान और गेहूं का फसल काटने के बाद जो ठूंठ बच जाता है, उसकी जुताई कर खेत में मिलाकर खाद बनाया जा सकता है। लेकिन किसान इसको खाद बनाने के बजाय जला देते हैं, जो महानगरों, नगरों, शहरों, कस्बों व गांवों की हवा को दूषित करता है।
सार्वजनिक परिवहन की कमीः देश में जनसंख्या और गाड़ी-मोटर बढ़ने के साथ-साथ सड़कों का चैड़ीकरण उस अनुपात में नहीं हुआ, जिस अनुपात में होना चाहिए था। सार्वजनिक परिवहन के साधन बस, मैट्रो और रेल सुविधाएं नहीं बढ़ी। बढ़ी भी, तो भीड़भाड़ से मुक्त नहीं हैं। लोग निजी वाहनों पर आश्रित रहने लगे, जिससे पेट्रोल-डीजल का दूषण बढता चला गया।
अंधाधुंध निर्माण कार्यः शहरों के आकार बढ़ने के साथ-साथ भवन, इमारत, बंगले, फ्लेट्स, काम्पलेक्स, माल और मल्टीप्लेक्स तथा कच्ची-पक्की सड़को का निर्माण तेजी से होने लगा, जो धूल-मिट्टी-गिट्टी के प्रदूषण को बढ़ाने का काम ही किया।
सेप्टिक टैंक के शौचालयों का निर्माणः यह प्रमाणित सत्य है कि सेप्टिक टैंक के करीब के जलस्त्रोंतों में इन टैंकों का दूषित पानी रिसकर जलस्त्रोतों में चला जाता है, जो देश के लाखों‘-करोड़ो हैंडपंपों, ट्यूबबेलों, कुंओं, तालाबों, नालों और नदियों को प्रदूषित करता है।ं यह समस्या गांवों मंे अति गहन है। इसके स्थान पर जहां जगह है, वहां दो सोक्ता गड्ढे वाले शौचालय का निर्माण किया जाना चाहिए। इससे मल से खाद का निर्माण संभव है, जो जहां जल स्त्रोतों को अशुद्ध होने से बचाता है, वहीं पर्यावरण को शुद्ध रखता है।
आद्यौगिकीकरणः उद्योगों से निकलनेवाला धुंआ हवा और तरल पदार्थ जल को दूषित करता है। यही कारण है कि पतितपावनी गंगा, यमुना, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, सिंधु, ब्रह्यपुत्र और नर्मदा सहित तमाम छोटी-बड़ी नदियां दूषण को प्राप्त हो गई हैं। इनके किनारे लगे हुए उद्योगों और बसे हुए लोगों का गंदा पानी इन नदियों में बहकर सदानीरा नदियों को प्रदूषित कर रहा है।
स्वार्थपूर्णता और देशभक्ति का अभावः देश में लोगों का स्वार्थ साफ-सुथरे वातावरण को बनाये रखने में आड़े आता है। लोग अपने घर का कचरा सड़कों और नालियों मंे फेंकते हैं। अपने स्वार्थ के लिए पर्यावरण को दूषित करने से बाज नहीं आते। यह प्रमाणीकरण नदियों में मूर्ति विसर्जित करने से लेकर फूलपान, दोना-पत्तल, पालीथिन व प्लास्टिक की थैली विसर्जित करने तक साबित होता है। लोग धर्म-कर्म की तो सोचते हैं, पर जल-थल के दूषण का नहीं। हमें जिसमें सास लेना है, जिसके पानी को पीना है और जिसकी मिट्टी से उत्पन्न खाद्यान्न खाना है, उसके प्रति जवाबदेही नहीं समझते। इसका खामियाजा पर्यावरण प्रदूषण के रूप में भुगतना पड़ रहा है।
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