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पेट्रोल-डीजल के खेल में सबके हाथ काले-भाग-2-वीरेंद्र देवांगना

पेट्रोल-डीजल के खेल में सबके हाथ काले-भाग-2
विदित हो कि एक्साइज ड्यूटी से केंद्र सरकार और वैट व लोकल टैक्स से राज्य सरकारें उपभोक्ताओं के पाकिट में सेंधमारी 70 सालों से कर रही हैं। फिर चाहे केंद्र या राज्यों में किसी पार्टी की भी सरकार हो। न केंद्र ने उत्पाद शुल्क घटाया, न राज्यों ने वैट या सेल्स टैक्स में कटौती की। इससे तो यही सिद्ध होता है कि इस मामले में सब एक ही थैले के चट्टे-बट्टे हैं। सबने आम उपभोक्ताओं को बेवकूफ बनाया है। यहां तक कि ईमानदारी का ढ़िंढोरा पीटकर सत्ता पर काबिज हुई ‘‘आप’’ सरकार भी इस मसले पर किसी से उन्नीस नहीं हैं।
ज्ञात हो कि इस डकैती लिए कोई आवाज नहीं उठाता। न ही धरना और हड़ताल करता है। न संसद में माईक तोड़ता है, न पेपर फाड़ता है। न कोई भाषणबाजी करता है, न पत्थरबाजी। वस्तुतः, काजल की कोठरी में सबके हाथ काले हैं। सोने का अंडा देनेवाली मुर्गी को कोई हाथ से जाने देना नहीं चाहता।
पेट्रोल भारत से श्रीलंका, बांग्लादेश एवं नेपाल कम कीमत पर बिकता है। जबकि ये देश भारत से काफी छोटे और कई मायने में बहुत पिछड़े और कमजोर हैं। क्या पड़ोसी देशों की इन सरकारों को जनता से टैक्स वसूलने की जरूरत नहीं होती? होती है। लेकिन, वहां की सरकारों में इतनी तो समझदारी होती है कि वह जनता को महंगाई के दलदल में ढकेलना नहीं चाहती।
अवगत हों कि इससे सभी सरकारों को मिलाकर प्रतिवर्ष करीब डेढ़ लाख करोड़ की आमदनी होती है।
केंद्र सरकार चाहे, तो वह अपने हिस्से का उत्पाद शुल्क कम कर आमजन को राहत दे सकती है, लेकिन वह ऐसा करने के बजाए राज्य सरकारों को अपना टैक्स कम करने की नसीहतें देती है। परिणाम यह है कि दो पाटों में आम उपभोक्ता पिस रहा है और राजकोषीय घाटे की भरपाई करने के लिए अपनी जेबें खाली कर रहा है और फजूल की विकास योजनाओं को चलाने में अपना अप्रत्यक्ष योगदान दे रहा है।
गौरतलब है कि पेट्रोल के दाम आसमान छूने पर सरकार के मंत्रियों का तर्क है कि लोग प्राइवेट गाड़ियों का इस्तेमाल कम-से-कम करें; इसलिए टैक्स लगाया जाता है। पर, क्या सरकार को पता है कि उसके सार्वजनिक परिवहन के साधन कितने उम्दा और कारगर हैं, जिससे लोग निजी वाहनों का कम-से-कम इस्तेमाल करेंगे?
सरकार का यह भी तर्क है कि इससे सड़क, स्कूल, अस्पताल, पुल-पलिया, बिजली, पानी जैसे विकास के कार्य किए जाते हैं, इसलिए टैक्स लिए जाते हैं। सरकार का यह तर्क भोंथरा है। डीजल के दाम में बढ़ोतरी से महंगाई बढ़ती है और इसका बोझ आम जनता पर पड़ता है। उसका कमर टूटता है। अब, ऐसे आधे-अधूरे विकास का क्या फायदा, जिसमें महंगाई के कारण लोगों का जीना दूभर हो रहा हो।
इसलिए सरकार को चाहिए कि पेट्रोल-डीजल पर उपभोक्ताओं का भ्रम दूर करने के लिए प्रत्येक पेट्रोल पंप पर एक डिस्प्लेबोर्ड लगाने का आदेश दे। इस साइनबोर्ड में प्रतिदिन का बेसिक मूल्य$केंद्रीय टेक्स$राज्यकर$डीलर का कमीशन प्रत्येक लीटर पर स्पष्ट तौर पर अंकित होता रहे, ताकि लोगों कोे मालूम चले कि ईंधन के इस खेल के खिलाड़ी कौन-कौन हैं।
इसपर नियंत्रण और राहत देने का एक ही तरीका है कि केंद्र और तमाम राज्य सरकारें अपने-अपने हिस्से का टैक्स कम करें और इसे भी जीएसटी के दायरे में लाकर देश को महंगाई से निजात दिलाएं। आगामी जीएसटी परिषद की बैठक में इस भूल को सुधारा जा सकता हैं।
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