।।राजनीत की सड़कों पर लोकतंत्र की बेबसी। – अंकित कुमार दुबे

।।राजनीत की सड़कों पर लोकतंत्र की बेबसी। – अंकित कुमार दुबे

राजनीति सियासत की आड़ में किसान की बेवसी, शिमला की जल समस्या सब की सब दम तोड़तीं नजर आ रही हैं। लोकतंत्र के गलियारों से होते हुए राजनीति की चौड़ी सड़को पर उतरने की हमने भरपूर कोशिश की है। 2019 के लोकसभा चुनाव ने इस कदर राजनीत की सड़क को जाम किया हुआ है कि महागठबंधन जैसे काफिले भी अब नज़र आने लगे हैं। विपक्षी किसी भी गोताही को बरतने के लिए तैयार नहीं है। इन्हीं हार जीत किसान की बेवसी, शिमला की जल समस्या औऱ महागठबंधन से आज के लेख की पूरी दास्तां भरी हुई है।

कुर्सी कितना महत्व रखता है अगर इस बात को जानना है तो राजनीति की हर पहलुओं को उठाकर देख लीजिए। इस समय राजनीति का जो दौर चला आ रहा है वह इस बात को प्रतिपादित करता है कि प्राण जाए पर राजनीति की कुर्सी ना जाए। आज इसी राजनीतिक कुर्सी ने कई दुश्मनों को एक कर महागठबंधन जैसा नाम दे दिया है। सत्ता पक्ष की हार होना विपक्ष का जीत होना 2019 की जीत का पूरी तरह से समीक्षा करता है। यूपी के चुनाव पर पूरे देश की नज़र टिकी हुई हैं। अपने ही घर में पूजे जाने वाले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की हार BJP को 2019 का परिणाम बताने के लिए काफी है। गोरखपुर , फूलपुर , कैराना और नूरपुर में लगातार इन 4 सीटों पर बीजेपी की हार दर्ज होना विपक्षी की सबसे बड़ी जीत और 2019 के लोकसभा चुनाव की उम्मीद है। कैराना लोकसभा चुनाव में जीत के साथ ही एक तरह से अजीत सिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल का एक बार फिर से पुनर्जन्म हुआ है। इसके साथ ही आरएलडी प्रत्याशी तबस्सुम हसन इस लोकसभा के लिए यूपी की पहली मुस्लिम सांसद बन गई है। सपा BSP कांग्रेस और आरएलडी की संयुक्त ताकत के आगे BJP की सारी रणनीति फेल होती नजर आई और कैराना नूरपुर में सीटें बीजेपी के हाथ से निकल गई। इन सबके बीच जुमलेबाजी का सिलसिला जारी है। राजनीतिक लहर ही कुछ ऐसी होती है कि दो दुश्मनों को बड़े प्रेम से एक कर देती है। RSS में रोजा इफ्तार पार्टी औऱ बुआ के गोद में बबुआ का बैठ जाना बहुत कुछ परिभाषित करता हैं। कल तक जिस बुआ और बबुआ का एक दूसरे पर कटाक्ष हुआ करता था आज वह एक ही थाली में खाते नजर आ रहे हैं। घबराने की बात नहीं है यह प्रेम कोई हृदय प्रेम नहीं है ,यह राजनीति प्रेम है। अब देखना यह है कि महागठबंधन राजनीति के किताब में किस तरह के इतिहास को रचती हैं। कैराना नूरपुर के सीट पर 2014 में लोकसभा चुनाव में BJP की जीत हुई थी । सांसद हुकुम सिंह को दो लाख से ज्यादा वोटों की जीत मिली थी लेकिन उस चुनाव में मोदी लहर के साथ ही मुजफ्फरपुर में जाट मुस्लिमों के बीच हुए दंगा भी मुद्दा था। जिससे बीजेपी को भी बहुत फायदा हुआ। इस चुनाव में अखिलेश यादव की एक चाल और बीजेपी की कामयाबी होने उसे हार की मुंह में धकेल दिया। महागठबंधन का शूमार इस कदर अखिलेश यादव पर चढ़ा की जीत के लिए अलग-अलग रणनीतियां बनाने लगे। मुस्लिम वोटर की ताकत पाने के लिए महागठबंधन के जरिए आरएलडी से सबसे पहले तबस्सुम को खड़ा किया जिससे उनको मुस्लिम वोटर का तो फायदा हुआ ही साथ ही आरएलडी नेताओं को जाटों के नाम पर वोट मांगने के लिए कहा। आपको बता दें कैराना में 5 लाख मुस्लिम वोटर है। जहां पर BJP की पूरी तरह से हार दर्ज हो चुकी है।

एक बात यह भी सच है कि महागठबंधन विपक्ष की उभरती ताकत के आगे BJP को काफी नुकसान उठाना पड़ सकता है। अगर 2019 के चुनाव में विपक्ष यही रणनीति अपनाता है तो निश्चित ही तौर पर BJP के सामने बड़ी मुश्किल आ सकती है जिसका सामना करने के लिए उसे अभी से तैयार होना पड़ेगा। यह तो बातें थी चौड़ी सड़क यानी राजनीति की चौड़ी सड़कों से जुड़ी हुई।

थोड़ी बात अगर लोकतंत्र के गलियारों की हो जाए तो 2019 के लोक सभा चुनाव के मुद्दे का अनुमान लगाया जा सकता है। एक दूसरे को हराने के लिए महागठबंधन का अमलीजामा पहने का जो सिलसिला जारी है देखना यह है कि क्या 2019 के लोकसभा चुनाव का राजनीतिक मुद्दा फिर से किसान के कर्ज माफ, युवाओं के रोजगार का रहता है। क्या इसी झूठे मुद्दे के आधार पर फिर से लोकतंत्र को मूर्ख बनाया जा सकता है। बहुत से सवाल है जिनका जवाब 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान ही देखने को मिलेगा। एक तरफ महागठबंधन दूसरी तरफ सत्ता का सिमटता दायरा क्या हार के मुंह से जीत को वापस ला सकती है या महागठबंधन का दौर 2019 मे अपने जीत का झंडा लहराएगा। बहुत से मुद्दे हैं फिलहाल महागठबंधन सबसे बड़ा मुद्दा बन गया है कुर्सी को किसी भी तरह हासिल करने के लिए। यूपी में बीजेपी का सफाया मुश्किलों के दलदल को और भी गहरा करती चली जा रही है ।अगर यही हाल रहा तो 2019 में बीजेपी को एक नई समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। जिसके लिए BJP को अभी से तैयार होने की जरूरत है।

इन सब के बीच ऐसा लगता हैं, 2019 के लोक सभा सीटों की सिचाई किसान और युवा रोजगार का हवाला देते हुए किया जाये गा। रह गई बात शिमला जल समस्या की तो इन सब के बीच बस यही कहा जा सकता हैं कि राजनीति प्यास के आगे लोकतंत्र की प्यास अब बूझने से नही रही।

अंकित कुमार दुबे

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