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सांप्रदायिकताः एक चुनौती-वीरेंद्र देवांगना

सांप्रदायिकताः एक चुनौती
विगत रामनवमी के जुलूस मार्ग परिवर्तन के बहाने पश्चिमी बंगाल के आसनसोल में दो संप्रदाय आमने-सामने आ गए। वे देखते ही देखते परस्परं तलवारें, लाठियां, लट्ठ, गंडा, हाकी स्टिक, राड भांजना शुरू कर दिए। फलस्वरूप मोटरसायकिलें, गाड़ियां, दुकानंे और करोड़ों की सार्वजनिक संपत्तियां पलभर में स्वाहा हो गई। आमजन इस बदहवासी में ऐसे फंसे कि कइयों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।
आसनसोल में सहसा भड़का दंगा समूचे राज्य को अपने आगोश में ले लिया। फिर यह पड़ोसी राज्य बिहार के समस्तीपुर, गया, दरभंगा, सीवान, औरंगाबाद, भागलपुर, नवादा को अपनी चपेट में लिया। बिहार के कई जिले तो हिंसा की आग में 14-15 दिनों तक झुलसते रहे। इसकी देखा-देखी यह आग गुजरात के सूरत तक फैल गया। वहां दो समुदायों के बीच तीखी झड़पें हुईं। दोनों ओर से जमकर पत्थरबाजी की गई। पाकिस्तान जिंदाबाद/मुर्दाबाद के नारे लगे सो अलग।
स्थिति को नियंत्रित करने के लिए हालांकि पुलिस-प्रशासन जुटी रही, लेकिन यह असरकारी साबित नहीं हुआ। पुलिस जवान कम थे, तो उपद्रवी अधिक। इससे पुलिस बौना साबित हो रही थी। दंगाइयों को राजनीतिक व धार्मिक दलों, गुटों व पंथों का कहीं मौन, तो कहीं खुला समर्थन हासिल था और वे तादाद में भी अधिक थे।
केद्रीय गृह राज्यमंत्री-हंसराज अहीर ने फरवरी 2018 में लोकसभा में जानकारी देते हुए कहा है कि साल 2017 में सांप्रदायिक हिंसा की देशभर में कुल 822 घटनाए हुई हैं, जिसमें 111 लोग हिंसा की चपेट में आकर असमय मौत को गले लगा चुके हैं और 2384 लोग जख्मी हो चुके हैं।
उपर्युक्त रिपोर्ट के मुताबिक, साप्रदायिक झड़प की सर्वाधिक घटनाएं उत्तरप्रदेश में हुई। इसके बाद क्रमशः कर्नाटक, राजस्थान, बिहार, मध्यप्रदेश व पश्चिमी बंगाल साम्प्रदायिकता की आग में झुलसे हैं।
सिक्ख दंगेः-31 अक्टूबर 1984 को अपनी प्रिय नेत्री श्रीमती गांधी की निर्मम हत्या से विचलित कांग्रेसियों ने सिक्ख समुदाय के लोगों को जहां-तहां मारना शुरू कर दिया। अकेले दिल्ली में ही करीब 3000 सिक्ख लूटे और मारे गये। पूरे देश में यह आंकड़ा 8000 के पार है।
इस पर जांच आयोग बैठा। अदालत में केश चला। 442 दोषियों में से 49 को आजीवन कारावास और तीन को मौत की सजा मिली, जिसे बाद मंे उम्रकैद में बदल दिया गया।
अयोध्या विवादः-1992 में अयोध्या में स्थित बाबरी मस्जिद समुदाय विषेष के द्वारा ढहाया गया। बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि का यह विवाद सांप्रदायिकता की जीती-जागती मिसाल बन गया था, जो समय से कोर्ट-कचहरी में झूल रहा था। लेकिन अब इसका सम्मानजनक समाधान सुप्रीमकोर्ट के द्वारा किया जा चुका है।
भीमा-कारेगांव का जातीय संधर्षः-1 जनवरी 2018 को कतिपय मराठाओं और दलितों के बीच हुए गंभीर वाद-विवाद में एक व्यक्ति की मौत हो गई, जिससे मामला उग्र हो गया। हिंसक भीड़ ने जहां-तहां पथराव कर गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया। चक्का जाम से राज्यभर में अशांति फैलाने की कोशिशें की गई।
गौरतलब है कि 01 जनवरी को महाराष्ट्र के पुणे जिले के भीमा-कोरेगांव में दलितों के द्वारा शौर्य दिवस मनाया जाता है, जिसमें हजारों की संख्या में दलित समुदाय के लोग कोरेगांव के जयस्तंभ में एकत्र होते हैं। इस साल यह जलसा विजय दिवस के 200 साल पूरा होने के उपलक्ष्य में मनाया जानेवाला था, जिसके लिए दलित समुदाय के लोगों में खासा उमंग था।
इतिहासः-भारतवर्ष में लंबे समय से न केवल वर्ण-व्यवस्था लागू रही है, वरन् मुस्लिम व फिरंगी शासकों का राजकाज रहा है। एक ओर वर्ण-व्यवस्था भेदभावपरक थी, जो ऊंच-नीच, जांत-पांत के बंधनों में देशवासियों को जकड़ती थी, तो दूसरी ओर विदेशी हुक्मरान अपने धर्म के प्रसार व विस्तार के लिए बहुतेरे प्रयास कर रहे थे।
वे कभी तलवार की धार पर धर्म परिवर्तन करवा रहे थे, तो कभी प्रलोभन, भय और आतंक पैदा कर। इसी का दुष्परिणाम है कि जब भारत को आजादी देने की बात आई, तब मुस्लिम लीग के द्वारा मुस्लिमबहुल क्षेत्र को अलग कर मुस्लिम-राष्ट्र बनाने की मांग रखी गई। यही वह द्विराष्ट्रवाद का सिद्धांत था, जो विभाजन के बाद भी नासूर बना हुआ है। हिंदूबहुल क्षेत्र को भारत (हिंदुस्तान) और मुस्लिमबहुल क्षेत्र को पाकिस्तान राष्ट्र का दर्जा तो मिला, लेकिन इसके बाद हुए रक्तपात से दोनों कौमें थर्रा उठीं।
दरअसल, खंड भारत या पाकक्षे़त्र में कई क्षेत्र ऐसे रह गए, जहा कहीं मुस्लिमों की आबादी अधिक थी, तो कहीं हिंदुओं की। जब विभाजन हुआ, तब गलतफहमी और परस्पर राग-द्वेष से सांप्रदायिक चिंगारी भयंकर मारकाट में बदल गई। जिसमें ज्यादातर बेकसूर रहवासी चपेट में आए।
पाकिस्तान से टेªन भर-भरकर हिंदुओं की रक्तरंजित शव भारत आने लगी, तो बदले में हिंदुओं ने मुसलमानों की लाशें काट-काटकर भेजनी शुरू कर दी। इस बदहवास अमानुषिकता में 10 लाख लोगों की जानें चली गईं। करीब 1.50 लाख महिलाओं की अस्मिता तार-तार हो गई। 1.50 करोड़ लोग बेधरबार होकर दाने-दाने को मोहताज हो गए।
चूंकि भारत में सभी धर्मावलंबी निवासरत थे, इसलिए यहां लोगों को मनपसंद धर्म अपनाने की आजादी संविधान से प्रदत्त की गई। लिहाजा हिुदस्तान धर्मनिरपेक्ष देश बना। चूंकि पाकिस्तान का जन्म मुस्लिम बहुलता की वजह से हुआ था, इसलिए वहां का राष्ट्रधर्म इस्लाम कहलाया।
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