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सार्वजनिक-स्थलों पर कब्जा अस्वीकार्य-वीरेंद्र देवांगना

सार्वजनिक-स्थलों पर कब्जा अस्वीकार्य::
सुप्रीमकोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने एक अधिवक्ता द्वारा दायर याचिका पर वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि विरोध प्रदर्शन के अधिकार और अन्य लोगों के आने-जाने जैसे अधिकारों के बीच संतुलन बनाना होगा। लेकिन, कर्तव्यों को लेकर जवाबदेही भी है। लोकतंत्र व असहमति साथ-साथ चलते हैं, लेकिन विरोध-प्रदर्शन निश्चित स्थान पर होना चाहिए। शाहीन बाग खाली कराने के लिए दिल्ली पुलिस को कार्रवाई करनी चाहिए थी। प्राधिकारियों को खुद कदम उठाना चाहिए था। वे अदालत की आड़ नहीं ले सकते। प्रशासन को बंदूक चलाने के लिए कंधा देना अदालत का काम नहीं है।
यहां गौर करनेवाली बात यह भी कि शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों से बातचीत करने के लिए जब कोर्ट ने ही वार्ताकार नियुक्त कर दिया था, तब पुलिस-प्रशासन कैसे कार्रवाई के लिए हौसला बढ़ाता। ऐसा आदेश तो तत्क्षण आना चाहिए था, जब अवैधानिक प्रदर्शन हो रहे थे।
उन्होंने यह भी कहा कि ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आंदोलन के तरीके अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था में नहीं अपनाए जा सकते। सड़कों पर कब्जा कर असुविधा पैदा करने की कानून में इजाजत नहीं। उन्होंने यह दलील नामंजूर की कि विरोध के लिए बड़ी संख्या में लोग जब चाहे, कहीं जुट सकते हैं।
विदित हो कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में सौ दिन से अधिक समय तक चले शाहीन बाग धरने के दौरान दिल्ली को तब भयावह दंगों की आग में झोंक दिया गया था, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का भारत भ्रमण था। इस दंगे के पीछे पापुलर फ्रंट आफ इंडिया के होने के सुराग एसआईटी को मिले हैं। कहा जाता है कि इस संगठन का दफ्तर शाहीन बाग में ही है।
नागरिकता संशोधन कानून, जिसका संबंध अफगानिस्तान, पाकिस्तान व बांग्लादेश के गैरइस्लामियों को भारत में नागरिकता देने से है, उसपर भारत के सौहार्द्रपूर्ण वातावरण को विषाक्त करने का काम जिस बदनीयत से किया गया था, उसकी संपूर्ण परतें तो सघन जांच से सामने आएगी, लेकिन इतना कहा जा सकता है कि धरना व दंगा सोची-समझी साजिश का ही नतीजा था।
अब, यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि देश में कहीं धरना, हड़ताल या धार्मिक क्रियाकलाप सार्वजनिक स्थलों पर कदापि न होने पाए। इसको देखना सभी राज्यों के जिलों के पुलिस-प्रशासन का काम है। सुप्रीमकोर्ट के साफ निर्देश के बावजूद, यदि ऐसा होता है, तो पुलिस-प्रशासन को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।
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Virender Dewangana

Virender Dewangana

मैं शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त हूँ। लेखन में रुचि के कारण मै सेवानिवृत्ति के उपरांत लेखकीय-कर्म में संलग्न हूँ। मेरी दर्जन भर से अधिक किताबें अमेजन किंडल मेंं प्रकाशित हो चुकी है। इसके अलावा समाचार पत्र-पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं निरंतर प्रकाशित होती रहती है। मेरी अनेक किताबें अन्य प्रकाशन संस्थाओं में प्रकाशनार्थ विचाराधीन है। इनके अतिरिक्त मैं प्रतियोगिता परीक्षा-संबंधी लेखन भी करता हूँ।

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