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सत्ता की मदांधता-वीरेंद्र देवांगना

सत्ता की मदांधता::
रिपब्लिक भारत के प्रधान संपादक अर्नब गोस्वामी को मुंबई के समीपवर्ती जिले रायगढ़ की पुलिस ने 2018 के खुदकुशी के मामले में गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जिसे कोर्ट ने 14 दिनों के न्यायिक हिरासत में रखने का आदेश दिया था।
जबकि अलीबाग मजिस्ट्रेट कोर्ट के अनुसार 2019 में बंद हो चुकी मामले की जांच पुनः शुरू करने के लिए पुलिस ने कोर्ट से अनुमति लिए बगैर कार्रवाई की है।
गौरतलब है कि मई 2018 में रायगढ़ के अलीबाग में एक वास्तुविद की उस आत्महत्या के मामले में गिरफ्तारी की गई है, जिसकी फाइलें बंद कर दी गई थी। गिरफ्तारी के दौरान अर्नब की बेल्ट को पकड़कर खींचतान की गई। उनकी रीढ़ की हड्डी व चोटिल दाएं हाथ पर प्रहार भी किया गया।
रिपब्लिक भारत विगत छह माह से पालघर मंे दो वयोवृद्ध साधुओं की निर्मम हत्या, सुशांत सिंह राजपूत और दिशा सालियान की आत्महत्या, ड्रग्स सिंडिकेट, कंगना रानावत, साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के मामले को लेकर लगातार अभियान चला रहा था।
इसके पूर्व टीआरपी घोटाले में भी रिपब्लिक भारत का नाम पुलिस ने जानबूझकर उछाला था, लेकिन बार्क ने जब आर भारत के खिलाफ आरोप से इंकार कर दिया, तो मामला रफा-दफा कर दिया गया।
रिपब्लिक टीवी का कसूर इतना था कि वह महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे, मुंबई पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह और सोनिया गांधी का नाम लेकर उन्हें सीधे निशाने पर ले रखा है।
अर्नब की गिरफ्तारी को जहां कई मीडिया संस्थानों ने अभिव्यक्ति की आजादी को दबाने का कुत्सित प्रयास कहा है, वहीं साधु-संतों ने गिरफ्तारी के विरोध में अभियान छेड़ने की बात कही है।
इसे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने विरोधी स्वर दबाने की शर्मनार कार्रवाई करार दिया है। वहीं प्रेस व अभिव्यक्ति की आजादी को कुचलने के प्रयासों को इमेरजंेसी से तुलना किया है।
दूसरी ओर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने इसे सत्ता का खुल्लम-खुल्ला दुरुपयोग बताते हुए लोकतंत्र के चैथे खंबे के साथ-साथ व्यक्तिगत आजादी पर भी हमला कहा है।
इसी तरह के बयानों से सूचना एवं प्रसारणमंत्री प्रकाश जावड़ेकर, कपड़ामंत्री स्मृति ईरानी, कानूनमंत्री रविशंकर प्रसाद, रेलमंत्री पीयूष गोयल, विदेशमंत्री एस जयशंकर, रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने इस दमनकारी कार्रवाई की निंदा की है।
वहीं, महाराष्ट्र सरकार से दो-दो हाथ कर चुकी कंगना रनोत ने ट्वीट कर घटना पर तंज कसा है कि अर्नब सर, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की कीमत चुकाने के लिए उन्हें खुद पर हमला करने दीजिए। बाल खींचने दीजिए। आजादी का कर्ज चुकाना है।
उधर, शिवसेना सांसद संजय राऊत दे सफाई देते हुए कहा है,‘‘महाराष्ट्र सरकार कभी बदले की भावना से कार्रवाई नहीं करती। महाराष्ट्र में कानून का राज है। पुलिस को जांच में कोई सुबूत हाथ लगा होगा। सुबूत मिलने पर पुलिस किसी को नहीं छोड़ती है।’’
वहीं, कांग्रेस इसे मौकापरस्त आक्रोश करार दिया है। उसके प्रवक्ता का कहना है कि उप्र में पत्रकार, पवन जायसवाल को मिर्जापुर में छोटे बच्चों को नमक और रोटी खिलाए जाने का सच दिखाने के लिए जेल में डाल दिया जाता है।
वाराणसी में एक गांव के कुप्रबंधन का सच सामने लाने के लिए पत्रकार सुप्रिया शर्मा और एक ट्वीट के लिए प्रशांत कनौजिया के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया जाता है।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि स्टूडियो में 12-15 लोगों को बिठाकर, चिल्लाकर, अनर्गल बातें करके, बड़ी-बड़ी गालियां देते हुए आरोप लगाकर ये लोग क्या दिखाना चाहते है?
यह सच है कि अर्नब गोस्वामी की पत्रकारिता करने की आक्रामक व चीख-पुकार शैली से इत्तफाक नहीं रखा जा सकता, किंतु सच्चाई उजागर होने पर खुन्नस निकालने के लिए किसी वरिष्ठ पत्रकार की यूं गिरफ्तारी करना भी शोभनीय कृत्य नहीं ठहराया जा सकता।
सुप्रीमकोर्ट से जमानत
शुक्र है कि देश में सुप्रीमकार्ट है, जिसने अर्नब गोस्वामी को जमानत देते हुए बांबे हाईकोर्ट व महाराष्ट्र सरकार पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि हाईकोर्ट ने न्याय नहीं किया। अगर व्यक्तिगत आजादी पर बंदिशें लगाई जाती है, तो यह न्याय के साथ मजाक होगा।
शिखर कोर्ट ने यह भी कहा कि विचारधारा और मतभिन्नता के आधार पर लोगों को निशाना नहीं बनाना चाहिए। राज्य सरकारों को पता होना चाहिए कि नागरिकों की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए शीर्ष अदालत मौजूद है।
हिरासत पर सवाल
इधर अर्नब गोस्वामी के वकील हरीश साल्वे ने उनकी गिरफ्तारी पर सवाल उठाया है कि जिस केस में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल हो चुकी हो, उसमें कोर्ट की इजाजत के बगैर फिर से जांच कैसे शुरू हो सकती है और कैसे किसी को गिरफ्तार किया जा सकता है?
उन्होंने महाराष्ट्र सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि आत्महत्या के लिए उकसाने के केस में अभियुक्त का अपराध का इरादा होना चाहिए। यहां इरादा कहां है?
पीठ ने महाराष्ट्र सरकार से सवाल किया कि इस मामले में आत्महत्या के लिए उकसाने का केस कैसे बनता है?
अंत में, समझ से परे यह भी कि मौकापरस्त बुद्धीजीवियों, वामपंथी लेखकों व मानवाधिकारवादी पत्रकारों के मुंह में ताले क्यों लगे हुए हैं, जो जरा-जरा सी बात पर अपनी पुरस्कार वापसी का ढोंग करते रहते हैं। उनके लिए गर यही लोकशाही है, तो तानाशाही व हिटलरशाही क्या है? इसका जवाब उन्हें देर-सबेर देना ही होगा।
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Virender Dewangana

Virender Dewangana

मैं शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त हूँ। लेखन में रुचि के कारण मै सेवानिवृत्ति के उपरांत लेखकीय-कर्म में संलग्न हूँ। मेरी दर्जन भर से अधिक किताबें अमेजन किंडल मेंं प्रकाशित हो चुकी है। इसके अलावा समाचार पत्र-पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं निरंतर प्रकाशित होती रहती है। मेरी अनेक किताबें अन्य प्रकाशन संस्थाओं में प्रकाशनार्थ विचाराधीन है। इनके अतिरिक्त मैं प्रतियोगिता परीक्षा-संबंधी लेखन भी करता हूँ।

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