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स्वयं के उत्थान के लिए आत्म निरीक्षण-रेणु -शाक्य

क्या है जटिलता और कहां है यह चिंत इतना उलझा हुआ क्यों है? यह चित्र इतना खंड खंड क्यों है? एक दूसरे के विरोध में निरंतर संलग्न क्यों है
हमें भ्रम यह रहता है कि हम एक व्यक्ति हैं हमारे भीतर न मालूम कितने व्यक्तियों की भीड़ जमा रहती है हम न मालूम कितने स्वरों को भीतर सजाए रखते हैं हमारे भीतर ना मालूम कितनी आवाज एक ही साथ एक दूसरे का विरोध में उठती रहती हैं एक दूसरे की अखंडता में उठती रहती हैं शाम को आप तय करके सोते हैं कि सुबह 4:00 बजे उठूंगा और सुबह 4:00 बजे आपके ही भीतर कोई कहता है कि रहने दे आज से क्या बात है कल उठ लूंगा दूसरे दिन आप फिर पछताते हैं और सोचते हैं कि यह तो बहुत बुरा हुआ यह कैसे हुआ कि मैं नहीं उठा और आज तो मैं पक्का संकल्प करता हूं कि आज की रात उठूंगा और फिर सुबह 4:00 बजे आप पाते हैं कि आपके भीतर कोई कहता है कि सोए भी रहो उठने में क्या सार है यह सब फिजूल की बातें हैं देर से उठो की जल्दी उठो क्या फर्क पड़ता है
क्या सांज को जिसने निर्णय किया था कि सुबह उठ लूंगा वही सुबह 4:00 बजे कहने लगता है कीमत उठ नहीं कोई दूसरा स्वर कोई दूसरा खंड व्यक्तित्व का कोई दूसरा कौना है बोलने लगता है l
क्रोध होता है तो क्रोध कर लेता है क्रोध चला जाता है तो पछताता है और सोचता है कि बहुत बुरा हुआ यह कौन सोचता है बहुत बुरा हुआ? क्या क्रोध करने वाला और यह सोचने वाला एक ही है? अगर यह एक ही है तो फिर क्रोध कैसे किया था? यह कोई दूसरा हिस्सा है जो कहता है पछताता है और फिर कल हजार दफा तय करने के बाद भी क्रोध नहीं करूंगा कल फिर क्रोध कर लेता है यह क्रोध करने वाला कौन है फिर?
एक एक आदमी के भीतर भीड़ है आदमियों की बहुत से आदमी हैं आदमी मल्टी साइकिक है एक ही मन नहीं है उसके भीतर बहुत से मन हैं बहुत से चित हैं और इन बहुत से मनोर में इतना उलझन है इतना विरोध है कि हालत वैसे ही है जैसे एक बैलगाड़ी में चारों तरफ बैल ज्योत से बंधे हुए हैं और सभी बहनों को भगाया जा रहा है और रेलगाड़ी की स्थिर पंजर डावाडोल हो रहा है वह गाड़ी कहीं जाती ना होगा घसीटती हो थोड़ी देर एक तरफ थोड़ी देर दूसरी तरफ और बैल सब तरफ जाते हो और खींचे जा रहे हो कहीं पहुंचना हो सकेगा क्या? नहीं थोड़ी देर में गाड़ी के स्थिर पंजर ढीला हो जाएगा थोड़ी देर में गाड़ी के टुकड़े टुकड़े लेकर बैल भाग जाएंगे गाड़ी नष्ट हो जाएगी पहुंचना कहीं भी नहीं होगा हर आदमी किसी ब्रांच नष्ट हो जाता है कहीं पहुंचना नहीं हो पाता
जीवन में पहुंचना तब संभव है जब जीवन में एक दिशा हो एकचित एक जीवन में एक मन हो खंड खन्ना हो चित अखंड हो अखंड मन ही सरलता चित होता है खंडित चित सरल चित नहीं हो सकता खंडित चित ही जटिल चित टुकड़ों टुकड़ों में टूटा हुआ चित और यह जो यह स्थिति कैसे बन गई है? यह कैसे खड़ी हो गई है यह सबके ऊपर दुर्भाग्य कैसा है कि हमारा अखंड चित नहीं है खंड खंड ही टूटा हुआ है कौन से कारण हैं?
कुछ कारण है बुनियादी पहला कारण हमारी शिक्षा हमारी संस्कृति हमारी सभ्यता हमारे जीवन के सारे प्रभाव एक अजीब पागलपन हर आदमी में पैदा करवा देते हैं और वह यह है कि कोई भी आदमी खुद होने को राजी नहीं है हर आदमी कोई और होना चाहता है कोई मनुष्य जमीन पर वही होने को राजी नहीं है जो वह है कोई और होना चाहता है अब होना चाहता है बा सा होना चाहता है एक भी आदमी वही होने को राजी नहीं है जो वह है और तब तब चित जटिल हो जाता है
कैसे यह ठीक हो? क्या करें?
पहली बात अपने होने का शिकार कर लो स्वस्थ मन का पहला लक्षण है वह जो है वैसा है उसे सहजता से स्वीकार करता है कुछ और होने की दौड़ में नहीं पड़ता है जो अपने होने को वैसा है जो है उसे सरलता से स्वीकार करता है स्वयं की स्वीकृत चित्र की सरलता की तरफ पहला कदम है आप अपने को शिकार करते हैं? अगर नहीं तो आप का चित कभी भी सरल नहीं हो पाएगा लेकिन घबराहट लगती है कि अगर हमने अपने को स्वीकार कर लिया तो हम तो बहुत बुरे आदमी हैं बेईमान हैं चोर हैं हिंसक हैं क्रोधी हेलो भी हैं मोही है और ना मालूम क्या-क्या है अगर हमने आपको स्वीकार कर लिया है तो फिर तो हम गए फिर तो हम रह जाएंगे चोर बेईमान को दी काम ही फिर तो हम में कोई परिवर्तन नहीं हो सकेगा ।
मैं आपसे आवेदन करता हूं तभी परिवर्तन हो सकेगा जब आप अपने को स्वीकार करेंगे उसके पहले कोई परिवर्तन नहीं हो सकता क्यों? क्योंकि जब हिंसक आदमी अहिंसक होने की कोशिश में लग जाता है तो उसको पता नहीं है कि हिंसा आदमी अहिंसक होने की कोशिश कभी अहिंसक नहीं हो पाता सिर्फ अपनी हिंसा को ढक लेता है और अहिंसा के वस्त्र पहन लेता है ऊपर से अनशक्ति बात करने लगता है और भीतर हिंसा पलती है ऊपर से अक्रोध और शांति की बातों में लगता है भीतर क्रोध पलता है जीवन की क्रांति का मार्ग कुछ और है वह चित की विकृतियों को छुपा लेने का नहीं चित की विकृतियों का विरोध में कोई दूसरा सिद्धांत खड़ा कर लेने में नहीं बल्कि चित्त की विकृतियों के चित मैं जो जो बुराइयां हैं उनके सम्यक दर्शन का है उनके ठीक-ठीक निरीक्षण का है उनसे ठीक-ठीक परिचित होने का है और अगर कोई व्यक्ति अपने भीतर की पूरी हिंसा को ठीक से जान ले और अपने क्रोध को ठीक परिचित हो जाए तो मैं आपसे कहना चाहूंगा कि यह ज्ञान यह बोध कि मेरे भीतर कितना क्रोध है और कैसा क्रोध है क्रोध के बाहर ले जाने का द्वार बन जाता है
जैसे हम यहां बैठे हैं और मकान में आग लग जाए और चारों तरफ आग की लपटें जलने लगे हैं और मैं आपको समझाऊं कि मकान में आग लगी है कृपया करके बाहर निकल जाएं और आपको आप दिखाई नहीं पड़ती हो तो आप कहेंगे कि जरूर मैं निकल लूंगा लेकिन थोड़ा काम कर लूं फिर निकल लूंगा थोड़ा अपनी पत्नी को पूछो पति ही पति से पूछूं मित्रों से पूछो फिर निकल जाऊंगा थोड़ा विचार कर लूं ऐसे जल्दी भी क्या है?
अगर आपको लगते ना दिखाई पड़ती हो और मैं आपको समझाऊं की आग लगी है बाहर निकल जाइए तो आप 25 बहाने करेंगे कि अभी मुझे जरूरी दूसरा काम है वह मैं कर लूं फिर निकल जाता हूं क्योंकि आपको लपटें दिखाई नहीं पड़ती हैं आप पूछेंगे कि महाराज लगते लगी हैं तो निकलने का मार्ग क्या है? विधि क्या है? मेथड क्या है? कौन से साधन करूं जिससे बाहर निकल जाऊं? यह सब पोस्टपोन करने की होशयारियां हैं यह पूछना कि कौन सी विधि है कौन सा मार्ग है कौन सा रास्ता है
लेकिन अगर आपको दिखाई पड़ गया कि आग लगी है तो किसी को उपदेश करने की जरूरत नहीं रह जाएगी अगर आपको दिखाई पड़ जाए कि मकान जल रहा है तो आप अपने बंगल मैं बैठे मित्र से भी नहीं पूछेंगे कि बाहर निकलो कि ना निकलो कोई यहां किसी से नहीं पूछेगा कि बाहर निकलना है या नहीं निकलना है हम सारे लोग फिर बाहर ही मिलेंगे वेतन मिलने की फुर्सत भी किसी को भी नहीं होगी सारे लोग बाहर हो जाएंगे बिना पूछे कि हम कैसे बाहर हो जाएं
अगर आग की लपटें दिखाई पड़ जाए तो वह दर्शन बाहर ले जाने का द्वार बन जाता है अगर किसी के भीतर अपना पूरा करो दिखाई पड़ जाए पूरे गिरना पूरा लोग पूरे हिंसा दिखाई पड़े तो इतनी जोर से लपट लगी हुई मालूम पड़ेगी कि भीतर आप रुक कर विचार करने की फुर्सत नहीं पाएंगे की मैं कैसे बाहर निकल जाऊं वह दर्शन वह वह आप को बाहर ले जाने के लिए अपने आप ही गहरी प्रेरणा बन जाएगा और आप बाहर हो जाएंगे
इसीलिए पहला सूत्र है चित की सरलता के लिए आप जो भी हैं कृपया करके हो सके अन्यथा होने की कोशिश ना करें। कुछ और बनने की कोशिश ना करें कृपया कोई आदर्श बन कर उसे ढांचे में अपने को ढालने की कोशिश ना करें पहली बात है आप जो हैं उसे पूरी तरह स्वीकार कर लो समग्र स्वीकृति जो मैं हूं चिंत की सरलता के लिए अनिवार्य शर्त है टोटल एक सलूशन पूरी तरह समग्ररूपेण मैं जो हूं पाप है तो पाप ग्रह है तो घृणा जो भी है मैं जो भी हूं उसी को पूर्ण स्वीकृति
और पूर्ण स्वीकृति के बाद दूसरा तत्व है अपने शरीर की आत्म निरीक्षण सेल्फ ऑब्जरवेशन क्या है मेरे भीतर उसे जानने की खोज जो आदमी कहीं चीजों के विरोध में होता है वह कभी निरीक्षण नहीं कर पाता क्योंकि वह उन चीजों को दबाता है दिखाना नहीं चाहता हम कभी अपने सत्र का निरीक्षण नहीं कर सकते क्योंकि जो हमारे शत्रु हैं उसे हम देखना भी नहीं चाहते तो निरीक्षण कैसे कर सकेंगे निरीक्षण तो हमें उसका कर सकते हैं जो मित्र है जिसे हमने स्वीकार किया है जिसे हमने अपने निकट लिया है उसका हम निरीक्षण कर सकते हैं
तो अगर क्रोध आपका शत्रु है तो आप उसका निरीक्षण कभी नहीं कर सकेंगे अगर लोग आपका शत्रु है तो आप उसका निरीक्षण कभी नहीं कर सकेंगे आप उसे दबा देंगे अपने हृदय के ऐसे कोने में जहां वह आपको कभी दिखाई न पड़े अगर सेक्स आपका शत्रु है तो उसको आप दवा देंगे ऐसे कोने में की उसका आपको दर्शन ना हो सके और जब भी वह दिखाई पड़े तब भगवान ईश्वर अल्लाह गॉड याद करके उसको और भीतर कर देंगे ताकि वह दिखाई न पड़े फिर वह सपने में आएगा ऐसे दिन में कभी नहीं आएगा क्योंकि आपने उसको अंधेरे कोने में दवा दिया है
इसीलिए अच्छे लोग बुरे सपने देखते हैं और बुरे लोग अच्छे सपने देखते हैं। क्योंकि बुरे लोग पक्षियों को दवा देते हैं वह सपने में आते हैं सभी बुरे लोग सपनों में सन्यासी हो जाते हैं और सभी अच्छे लोग सपनों में पाप करते हैं जो कि बुरे लोग दिन में करते हैं क्योंकि वह बुराइयों को दवा देते हैं वह सपनों में आते हैं हमारे भीतर हम दबाते रहते हैं इसे दमन से कोई छुटकारा नहीं होता और इस दमन से कभी आत्मनिरीक्षण नहीं होता है इसीलिए सप्रेशन नहीं दमन नहीं किसी चीज को दबाना नहीं बल्कि उसे जानना देखना उखाड़ना हमारी शिक्षा ने तथाकथित नैतिक शिक्षा में हर आदमी को दफन करना सिखा दिया है हर बात को दबा दिया है हर बात को नीचे दबा देते हैं फिर चित मैं विकृति शुरू हो जाती है क्योंकि दबी हुई ताकतें धक्का मारती हैं जैसे कोई बाप को दवा दे बर्तन के नीचे भाप चल रही हो और बर्तन के ऊपर पत्थर रख मैं तो भाप धक्का मारेगी और यह भी हो सकता है छोटी सी केतली अगर बंद कर दी जाए तो हो सकता है पूरे घर को विस्फोट में उड़ा दे सारा घर एक्सप्लेजन मैं हो जाए आग लग जाए।
इसीलिए एक एक आदमी का कर्तव्य है यह कि वह अपने मित्र se पागलपन को विदा करें सरल हो जाए जतिन को विदा करें यह न केवल उसके हित के लिए बल्कि सारे मनुष्य के हित के लिए है
धन्यवाद

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