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तीन तलाकः असंवैधानिक-3-वीरेंद्र देवांगना

तीन तलाकः असंवैधानिक-3
16वीं लोकसभा की तरह 17वंीं लोकसभा में भी तीन तलाक विधेयक फिर पास हो गया। इस पर बहस का जवाब देते हुए कानूनमंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा है कि विधेयक किसी धर्म, पूजा, इबादत के खिलाफ नहीं है, बल्कि नारी की अस्मिता, उसके सम्मान और मानवता के लिए है। उन्होंने यह भी कहा कि हिंदुओं के बीच प्रचलित कुरीतियों को दूर करने के लिए कई कानून बनानेवाली कांग्रेस 1986 में भारी बहुमत के बावजूद शाहबानो मामले में क्यों पीछे छूट गई।
संसद की कार्रवाई देखने की दिली इच्छाः
संसदीय इतिहास में यह पहला मौका था, जब सैकड़ों की तादाद में बुरकापरस्त मुस्लिम महिलाएं राज्यसभा की कार्रवाई देखने पहुंची थीं। आखिर जाती भी क्यों नहीं? उनमें से लगभग 3.5 प्रतिशत महिलाएं फोन पर; 7.6 फीसद महिलाएं पत्र के माध्यम से; 1 फीसदी औरतें एसएमएस, ईमेल, व्हाट्स एप, फेसबुक पर तथा 66 प्रतिशत स्त्रियां जुबां से तीन तलाकपीड़ित और प्रताड़ित थीं। वे अपनी हक की लड़ाई के लिए एकजुट हुई थंीं।
महिलाओं के प्रति अनाचार और अत्याचार करनेवाला मध्ययुगीन इस नियम को आधुनिककाल में भी जारी रखना, कहां की और कैसी समझदारी थी? फिर इसे सियासी अडंगेबाजी में अडंगा लगा देना, समझ से परे था। जबकि बिगडै़ल पड़ौसी पाकिस्तान सहित तमाम कट्टर मुस्लिम देशों में तीन तलाक को अलविदा कह दिया गया है।
यह कुरीति इस्लामी ऊसूल के खिलाफ है। कुरान में भी इसका कहीं वर्णन नहीं मिलता है। यह तो सीधा-सीधा मध्ययुगीन दासता के थोथे सिंद्धांत पर आधारित नारी-जाति को दबाने-कुचलने और उस पर राज कायम करने की बर्बर परंपरा है।
अन्य कुप्रथाएॅंः
यही नहीं, बाल विवाह (14-15 साल की बच्ची की शादी), बहुविवाह (चार निकाह, जिसने आबादी बढ़ाने में अहम रोल निभाया है) जैसी नापाक कुप्रथाओं पर भी पाबंदी जरूरी है, जो मुस्लिम समाज को गरीबी, अभावग्रस्तता, अशिक्षा, अज्ञानता और अपराध के भंवरजाल में ढकेल रहा है।
सरकार को चाहिए कि वह इस बाबत ऐसा कठोर कानून बनाए, जिसमें मुस्लिम महिलाओं को तलाकशुदा शौहर से न केवल पर्याप्त गुजारा भत्ता मिले, अपितु उनकी संपदा में हिस्सेदारी भी मिले। यह फैसला इस मायने में मुस्लिम महिलाओं के लिए टर्निंगपाइंट है और उन्हें यह हक हर हाल में लेकर रहने की जरूरत है।
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