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तीन तलाकः असंवैधानिक-2-वीरेंद्र देवांगना

तीन तलाकः असंवैधानिक-2
विधि आयोग का प्रतिवेदनः वस्तुतः,तीन तलाक कथित तौर पर मजहब का हिस्सा होने से किसी सियासी दल ने इसमें कोई दखल नहीं दिया था। जब उपर्युक्त मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने विधि आयोग से रायशुमारी की, तब राष्ट्रीय विधि आयोग ने सात अक्टूबर 2016 को देश से राय मांगी, तब इस पर देशवासियों में नई बहस छिड़ गई। मुल्कवासियों से ली गई दलील उन्होंने कोर्ट में इस प्रकार पेश की।
 तीन तलाक महिलाओं को संविधान में मिले बराबरी और गरिमा से जीवन जीने के हक का हनन है।
 यह धर्म का अभिन्न हिस्सा नहीं है, इसलिए इसे धार्मिक आजादी के मौलिक अधिकार में संरक्षण नहीं दिया जा सकता।
 पाकिस्तान, बांग्लादेश, तुर्की, इरान, इराक, मिश्र, सूडान, मलेशिया, सीरिया, इंडोनेशिया सहित 22 मुस्लिमबहुल मुल्क इसे दशकों पूर्व खत्म कर चुके हैं।
 धार्मिक आजादी का अधिकार बराबरी और सम्मान से जीवन जीने के अधिकार के अधीन ही है।
 सुप्रीम कोर्ट मौलिक अधिकारों का संरक्षक है। कोर्ट को विशाखा की तरह फैसला देकर इसे खत्म करना चाहिए।
 अगर कोर्ट ने हर तरह का तलाक खत्म कर दिया, तो सरकार नया कानून लाएगी।
शाहबानो की मिसालः
साल 1986 में शाहबानो लगातार कहे जानेवाले इस अमानवीय तीन तलाक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाकर केश जीत गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने तात्कालीन राजीव गांधी सरकार को निर्देश दिया था कि वह इसके खिलाफ नियम बनाए।
किंतु अफसोस कि आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के भारी दबाव में आकर तथा राजनीति के नफे-नुकसान का आकलन कर तात्कालीन सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ प्रचंड बहुमत के दम पर संसद में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ नियम पास करा लिया। जिस पर काफी बावेला मचता रहा था, लेकिन तात्कालीन सरकार के भारी बहुमत के आगे सबको झुकना पड़ा था।
वर्तमान प्रकरण में आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड की दलील गौरतलब है कि तीन तलाक इस्लाम का मूल हिस्सा नहीं है। कुरान में तीन तलाक की पूरी प्रक्रिया बताई गई है। पैगंबर मोहम्मद की मौत के बाद हनीफी में जो लिखा गया, वह बाद में आया है। उसी में तीन तलाक का जिक्र है। इस्लामिक शास्त्र कुरान में तीन तलाक का कहीं जिक्र नहीं है।
बहरहाल, जिन महिलाओं को तीन तलाक सहित कानूनी तौर पर तलाक दिए जाते हैं, उनकी माली हालत बेहद खराब हो जाती है। उनको दाने-दाने को मोहताज होना पड़ता है।
कानून बनने की राह में रोड़ेः
संसद के शीतकालीन सत्र में विधायी कार्याें में तीन तलाक का बिल सरकार ने शुमार किया था, लेकिन सत्र समाप्ति तक मुस्लिम महिलाओं को न्याय देनेवाला बिल संसद में पास न हो सका। जबकि भारत के शीर्ष कोर्ट की संवैधानिक पीठ इसे अवैधानिक करार दे चुकी है। इसे बीजेपीनीत जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार अपने बहुमत से लोकसभा में पास कराकर राज्यसभा में पेश की, तब काग्रेस ने अपने 250 सदस्यों के विरूद्ध 141 सांसदों के बलबूते इसमें अडंगा लगा दिया। परिणामस्वरूप इसे संसद की प्रवर समिति भेजना पड गय़ा।
उसका तर्क ओवैसी और कठमुल्लों-सा था और इन्ही के हाथों खेलता-सा प्रतीत हो रहा था कि इस कानून से शौहर (मियां) सलाखों के पीछे चला गया, तो बीवी-बच्चों का लालन-पालन कौन करेगा? गोया, अभी तक पर्सनल ला बोर्ड, कठमुल्ले, मौलाना-मुफ्ती और उसकी खिदमतगार मौकापरस्त पार्टियां करती रही हों।
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